रामपुर गार्डन में घरों के बाहर खड़ी होने वाली कारों के शीशों को तोड़ने वाले बाइकर्स बड़े घरों के शरारती बेटे निकले। पुलिस ने मामले का खुलासा किया तो पता चला कि यह करतूत किसी संगठित गिरोह की नहीं, बल्कि बड़े घरों के पांच नाबालिग लड़कों की है। कोतवाली पुलिस ने सीसीटीवी कैमरों की फुटेज की मदद से लड़कों को हिरासत में ले लिया है। पूछताछ में सामने आया कि कारों के शीशे तोड़ने वालों में अहम भूमिका आईवीआरआई के प्रधान वैज्ञानिक के बेटे की है। वह परिवार को कंबाइंड स्टडी के नाम पर गुमराह कर आधी रात तक रोडवेज और सेटेलाइट बस अड्डों पर दोस्तों के साथ सिगरेट पीता था। इसके बाद मौज मस्ती के लिए ये लोग बाइकों और स्कूटी से रामपुर गार्डन पहुंचकर कारों के शीशों को निशाना बनाते थे।
रामपुर गार्डन में पिछले दो महीनों से व्यवसायी और डॉक्टरों की कारों के शीशों पर पत्थर बरसाने की चार वारदातें सामने आ चुकी हैं। इससे कॉलोनीवासियों में दहशत थी। पुलिस के लिए ये घटनाएं चुनौती बनी हुई थीं। छानबीन में पुलिस को एक सीसीटीवी कैमरे की फुटेज मिली तो उससे घटना में इस्तेमाल सीबीआर बाइक की पहचान हुई, लेकिन नंबर स्पष्ट नहीं हुआ। तब पुलिस ने शहर में चलने वाली 39 सीबीआर बाइक की सूची निकालकर एक-एक पते पर जाकर सत्यापित किया। पुलिस सनसिटी विस्तार में रहने वाले आईवीआरआई के प्रधान वैज्ञानिक के घर पहुंची तो पता चला कि यह बाइक उनका सत्रह वर्षीय बेटा चलाता है। फुटेज से बाइक का मिलान करने के बाद पूछताछ में बाकी साथियों के नाम सामने आ गए।
नाबालिग दे रहे थे पुलिस को चुनौती, पकड़कर दिखाओ
वैज्ञानिक के बेटे से मिले सुराग से पुलिस आईटीसी, हिंदुस्तान लीवर लि. के उत्पादों के डिस्ट्रीब्यूटर के सत्रह वर्षीय बेटे, कृष्णा कॉलोनी में रहने वाले विधायक के रिश्तेदार के बेटे, साहूकारा में आर्टिफिशियल ज्वेलरी की दुकान के मालिक के बेटे और सिविल लाइंस में स्पोर्ट मैटेरियल की दुकान चलाने वाले व्यापारी के बेटे तक पहुंच गई। ये सभी एक निजी स्कूल में पढ़ने के समय से ही आपस में दोस्त हैं। पूछताछ में इन लड़कों नेे पुलिस को बताया कि पहली बार तो उन्होंने सिर्फ मौज मस्ती के लिए ऐसा किया था, लेकिन फिर अखबारों में खबर पढ़कर शरारत सूझी कि कारों के शीशे तोड़कर पुलिस को चुनौती देनी है कि वह उन्हें पकड़कर दिखाए।
होनहार हैं सभी लड़के, वैज्ञानिक कोतवाली में रोने लगे
गुद्दड़ बाग में रहने आर्टिफिशियल ज्वेलरी की दुकान चलाने वाले व्यापारी का बेटा पॉलीटेक्निक कॉलेज से मैकेनिकल प्रोडक्ट का कोर्स कर रहा है। उसने हाईस्कूल में 76 प्रतिशत अंक हासिल किए थे। वैज्ञानिक का बेटा भी होनहार है। उसके दसवीं की परीक्षा में 74 प्रतिशत अंक हैं। हाईस्कूल में ही विधायक के रिश्तेदार के बेटे ने 66 प्रतिशत, स्पोर्ट दुकान मालिक के बेटे ने 74 प्रतिशत और डिस्ट्रीब्यूटर के बेटे ने 69 प्रतिशत अंक हासिल किए थे। होनहार छात्रों की इस हरकत पर अभिभावक भी हैरान नजर आए। वैज्ञानिक तो पुलिस से बात करते हुए रोने लगे।
यहां नहीं रखूंगा, भेज दूंगा कोलकाता
वैज्ञानिक ने बताया कि उनका बड़ा बेटा आस्ट्रेलिया में कंप्यूटर साइंस की पढ़ाई कर रहा है। 2010 में वह अपने छोटे बेटे को भी लेकर जर्मनी गए थे, लेकिन वह आस्ट्रेलिया में पढ़ाई के लिए तैयार नहीं हुआ तो उसे अपने साथ ले आए। इस घटना के सामने आने के बाद से वह इस कदर परेशान हैं कि अब छोटे बेटे को यहां नहीं रखना चाहते। बोले, बेटा बुरी सोहबत में फंस गया है। अब उसे कोलकाता उसकी नानी के पास भेज दूंगा।
महिला दरोगा को मिली शाबासी
एसपी सिटी रोहित सिंह सजवाण ने पुलिस के लिए सिरदर्द बने लड़कों को पकड़ने में कामयाबी हासिल करने वाली चौकी चौराहा की प्रभारी दरोगा प्रीति पवार को शाबासी दी। उन्होंने बताया कि परिवारों को बच्चों पर नजर रखने की चेतावनी दी गई है। बच्चों की उम्र और उनका कॅरियर देखते हुए पुलिस ने कानूनी कार्रवाई करने के बजाय अभिभावकों से लिखवाकर लेने के बाद उन्हें छोड़ दिया।
नियमों को तोड़ने का मजा लेने वाले बच्चों में कंडक्ट डिस्ऑर्डर की समस्या होती है। ऐसे बच्चे दूसरों के घरों पर पत्थर फेंककर, गाली गलौच करने, मारपीट करने में खुशी महसूस करते हैं। बाल संप्रेक्षण गृह में भी एंटी सोशल डिस्ऑर्डर से ग्रसित बच्चे पहुंचते हैं। उन्हें एहसास ही नहीं होता कि वे दूसरों को नुकसान पहुंचा रहे हैं। ऐसे में बच्चों को काउंसिलिंग करके, बोर्डिंग में रखकर, पुलिस कस्टडी रखकर सजा देने से भी सुधार आता है। ऐसे बच्चों का इलाज भी कराया जाता है। इनके दोस्त भी इसी डिस्ऑर्डर के शिकार होते हैं।
- डॉ. आशीष सिंह, मनोचिकित्सक जिला अस्पताल
समृद्ध परिवारों के बच्चों में ये भावना आ जाती है कि हमारा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता है। यही उन्हें गलत रास्तों पर ले जाती है। बच्चों की परविश पर घर के माहौल का बहुत असर पड़ता है। वह अभिभावकों के सामाजिक व्यवहार को देखते हुए बढ़ते हैं। बच्चों की हरकतों को नजरअंदाज करना भी भारी पड़ता है। अब माता-पिता के पास बच्चों के लिए कम समय रहता है। इसकी वजह से बच्चे रास्ते भटक जाते हैं। फिल्मों में दिखाई जाने वाली युवाओं की आजादी ने भी बच्चों को विद्रोही बना दिया है। उन्हें काउंसिलिंग के जरिये समझाने की आवश्यकता है।
- डॉ. नवनीत आहूजा, समाजशास्त्री