बारह साल का एक बच्चा माता-पिता के होते हुए भी अनाथ की तरह श्री राममूर्तिस्मारक मेडिकल कालेज में एक असाध्य सी बीमारी से लड़ रहा है। आठ महीने पहले पिता ने भर्ती कराया था। एसआरएसएस के चिकित्सा अधीक्षक डॉ ब्रिगेडिर हांडा के अनुसार चार महीने से इसके मां-बाप उसे देखने तक नहीं आए। पुलिस से मदद मांगी, पूर्व जिलाधिकारी संजय यादव से भी मिले, कई संदेश भेजे लेकिन कोई नहीं आया। आखिरकार अस्पताल ने कोर्ट से मदद मांगी है कि बच्चे के मां- बाप को लाया जाए ताकि उसका आपरेशन किया जा सके। नियमानुसार अनेस्थीसिया देने से पहले घर वालों की इजाजत आवश्यक है। कोर्ट में सुनवाई हो चुकी है और फैसला सुरक्षित है। अच्छी खबर ये है कि अस्पताल के स्टाफ की सेवा से अब ये बच्चा व्हील चेयर पर बैठने लायक हो गया है लेकिन बुरी खबर ये है कि यदि समय पर इसके श्वांस नली में इन्फेक्शन और बेड सोर के लिए आपरेशन नहीं किया गया तो इसकी हालत बिगड़ सकती है।
स्पताल के वार्ड में भर्ती निशांत गंगवार देखने में ठीक लग रहा है, दूध पिलाने के लिए नाक में नली पड़ी है। श्वास नली में पड़ी ट्यूब निकाल दी गई है लेकिन नली के इन्फेक्शन और पिछले हिस्से में पड़े-पड़े जख्म हो जाने से तकलीफ में है। उसकी बीमारी का नाम है गिलन बैरी सिंड्रोम। ये ऐसी बीमारी है जिसमें नब्ज कमजोर पड़ जाती है, मांसपेशियां कमजोर होने लगती हैं और शरीर की हरकतें कम होने लगती हैं। यानी लकवे जैसी हालत हो जाती है। 16 जुलाई को निशांत को उसके पिता कांता प्रसाद और मां कुसुम लता ने अस्पताल में भर्ती कराया था। कुछ दिन बाद उन्होंने शहर के एक न्यूरो फिजीशियन की राय ली और फिर उसे सर गंगाराम अस्पताल दिल्ली ले गए। वहां भी डॉक्टरों ने बताया कि इसे लंबे समय तक अस्पताल में रखना पड़ सकता है। इलाज यही चलेगा लेकिन वेंटिलेटर की जरूरत है। मां बाप करीब 10 दिन बाद 17 अगस्त को उसे फिर एसआरएमएस लाए तो उसकी हालत और खराब हो चुकी थी। नवंबर में एक दिन अचानक उसके मां-बाप चले गए और फिर लौट कर आए ही नहीं। उनका पता अवध धाम कालोनी इज्जत नगर का लिखा है। ये लोग अब कहां हैं पता नहीं। अस्पताल में दर्ज उनके फोन नंबर पर अमर उजाला ने भी संपर्क करने की कोशिश की लेकिन फोन नहीं उठा। अवध धाम में कुछ लोगों से पूछा लेकिन कोई पता नहीं बता पाया। फिलहाल यही माना जा रहा है कि वे उसे लाइलाज मान कर छोड़ कर चले गए। डॉ संध्या चौहान उसका उपचार कर रही हैं। डॉक्टरों का कहना है कि इस समय उसे इमोशनल सपोर्ट की भी जरूरत है। वह मां बाप के लिए रोता है। बोल नहीं पा रहा है, आंखे चारों तरफ अपने मां-बाप को ढूंढती रहती हैं।
अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक ब्रिगेडियर हांडा ने बताया कि मसला सिर्फ इलाज के पैसों का नहीं, उस बारे में कोई विकल्प देखा जा सकता है लेकिन बच्चो को इमोशनल सपोर्ट चाहिए, उसका आपरेशन जरूरी है। उन्होंने एक बार पूर्व डीएम पंकज यादव से मिल कर भी मदद मांगी थी पुलिस से भी कहा लेकिन जब कुछ नहीं हुआ तो अस्पताल की ओर से सिविल जज शक्तिसिंह की अदालत में वाद दायर कर फरियाद की कि बच्चे के पेरेंट को निर्देशित किया जाए कि वे अपने बच्चे को अटेंड करें या डिस्चार्ज करा लें। एनेथिसिया व सर्जरी के मामले में रोगी के अभिभावक की सहमति आवश्यक होने से उसका उपचार भी नहीं हो पा रहा है। न्यायालय में सोमवार को इस मामले में सुनवाई हुई जिस पर न्यायालय ने आदेश के लिए एक मार्च की तिथि नियत की है।
कहां हो मां-बाबा! आ जाओ, अभी मैं जिंदा हूं
बारह साल के इस बच्चे का पोर पोर दुख रहा है। कुछ दिन पहले तक तो वह हिल-डुल भी नहीं सकता था अब व्हील चेयर पर बैठने लायक हो गया। श्वास नली की ट्यूब तो हट गई लेकिन गले में इन्फेक्शन हो गया है और पड़े-पड़ेे बेड सोर हो गए हैं। उसे तुरंत आपरेशन की जरूरत है लेकिन बिना मां-बाप की अनुमति के कर नहीं सकते। आठ महीने पहले पिता ने उसे श्री राममूर्ति स्मारक मेडिकल कालेज में भर्ती कराया था। माता-पिता उसे चार महीने पहले मेडिकल कालेज में ही अनाथ की तरह छोड़ कर चले गए। एसआरएसएस के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. ब्रिगेडिर हांडा के अनुसार पुलिस से मदद मांगी, पूर्व जिलाधिकारी पंकज यादव से भी मिले, कई संदेश भेजे लेकिन कोई नहीं आया। आखिरकार अस्पताल ने कोर्ट से मदद मांगी है कि बच्चे के मां- बाप को लाया जाए ताकि उसका आपरेशन किया जा सके। कोर्ट में सुनवाई हो चुकी है और फैसला सुरक्षित है।
अस्पताल के आईसीयू में भर्ती निशांत गंगवार एक नजर देखने में ठीक लग रहा है, दूध पिलाने के लिए नाक में नली पड़ी है। हल्का भोजन भी दे रहे हैं। उसकी बीमारी का नाम है गिलन बैरी सिंड्रोम (जीबीएस)। ये ऐसी बीमारी है जिसमें नब्ज कमजोर पड़ जाती है, मांसपेशियां कमजोर होने लगती हैं और शरीर की हरकतें कम होने लगती हैं। यानी लकवे जैसी हालत हो जाती है। 16 जुलाई को निशांत को उसके पिता कांता प्रसाद और मां कुसुमलता ने अस्पताल में भर्ती कराया था। कुछ दिन बाद उन्होंने शहर के एक न्यूरो फिजीशियन की राय ली और फिर उसे सर गंगाराम अस्पताल दिल्ली ले गए। वहां भी डॉक्टरों ने बताया कि इसे लंबे समय तक अस्पताल में रखना पड़ सकता है। इलाज यही चलेगा लेकिन वेंटिलेटर की जरूरत है। मां बाप करीब 10 दिन बाद 17 अगस्त को उसे फिर एसआरएमएस लाए तो उसकी हालत और खराब हो चुकी थी। नवंबर में एक दिन अचानक उसके मां-बाप चले गए और फिर लौट कर आए ही नहीं। उनका पता अवध धाम कालोनी इज्जत नगर का लिखा है। ये लोग अब कहां हैं पता नहीं। अस्पताल में दर्ज उनके फोन नंबर पर अमर उजाला ने भी संपर्क करने की कोशिश की लेकिन फोन नहीं उठा। अवध धाम में कुछ लोगों से पूछा लेकिन कोई पता नहीं बता पाया। फिलहाल यही माना जा रहा है कि वे उसे लाइलाज मान कर छोड़ कर चले गए। डॉ. संध्या चौहान उसका उपचार कर रहीं हैं। डॉक्टरों का कहना है कि इस समय उसे इमोशनल सपोर्ट की भी जरूरत है। वह मां बाप के लिए रोता है। बोल नहीं पा रहा है, आंखे चारों तरफ अपने मां-बाप को ढूंढती रहती हैं।
अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक ब्रिगेडियर हांडा ने बताया कि मसला सिर्फ इलाज के पैसों का नहीं, उस बारे में कोई विकल्प देखा जा सकता है लेकिन बच्चों को इमोशनल सपोर्ट चाहिए, उसका आपरेशन जरूरी है। उन्होंने एक बार पूर्व डीएम पंकज यादव से मिल कर भी मदद मांगी थी पुलिस से भी कहा लेकिन जब कुछ नहीं हुआ तो अस्पताल की ओर से सिविल जज शक्तिसिंह की अदालत में वाद दायर कर फरियाद की कि बच्चे के पेरेंट को निर्देशित किया जाए कि वे अपने बच्चे को अटेंड करें या डिस्चार्ज करा लें। एनेथिसिया व सर्जरी के मामले में रोगी के अभिभावक की सहमति आवश्यक होने से उसका उपचार भी नहीं हो पा रहा है। न्यायालय में सोमवार को इस मामले में सुनवाई हुई जिस पर न्यायालय ने आदेश के लिए एक मार्च की तिथि नियत की है।