चार साल पहले तक जांच में व्यस्त रहने वाली प्रदेश सरकार की विशेष जांच एजेंसी सीबीसीआईडी आजकल खाली हाथ है। इस एजेंसी को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के निर्देश पर गिनी चुनी जांच करने को मिलीं हैं। इससे पहले सरकार जिस आरोपी को राहत देना चाहती थी, उसकी जांच सीबीसीआईडी को सौंप दी जाती थी। उन दिनों विभाग के पास जांच के लिए मुकदमों की भरमार रहती थी, ये सभी मुकदमे पिछले साल खत्म हो गए। अब तो सिर्फ 14 मुकदमे ही जांच के लिए रह गए हैं। इनमें एक मामला मेरठ का है।
बरेली की सीबीसीआईडी बरेली के अलावा बदायूं, पीलीभीत, शाहजहांपुर, मुरादाबाद, जेपीनगर, रामपुर सहित नौ जिलों के आपराधिक मामलों की जांच करती है। इसके अलावा शासन, विभिन्न आयोग तथा कोर्ट के आदेश पर दूसरे जिलों की जांच भी यहां से कराई जाती रही हैं। दो साल पहले हाईकोर्ट ने प्रदेश सरकार के खिलाफ कई मामलों में जमकर खिंचाई की। उसी के बाद से प्रदेश सरकार ने सीबीसीआईडी के माध्यम से जांच कराने के आदेश बंद कर दिए हैं।
हाईकोर्ट में पीड़ित पक्ष सरकार पर यह आरोप लगाता रहा है कि आरोपी को बचाने के उद्देश्य से उनकी जांच सीबीसीआईडी से कराने के आदेश कर दिए हैं।
बयान
‘सरकार की ओर से सीबीसीआईडी के पास जांच कम भेजी जा रहीं हैं। अधिकांश जांच मानवाधिकार आयोग के निर्देश पर की जा रहीं हैं। ’ नरेश चंद्र वर्मा, उपाधीक्षक सीबीसीआईडी
मेरठ की उर्मिला के बारे में अनाथालयों से ब्योरा मांगा
बरेली। तीन साल से लापता मेरठ की उर्मिला की जांच कर रही बरेली की सीबीसीआईडी ने प्रदेश के सभी जिलों के अनाथालय, नारीनिकेतन गृह तथा अन्य संस्थाओं से जानकारी मांगी है। यह महिला मेरठ जिले के थाना सरुरपुर के गांव रासना की रहने वाली थी और 20 जून 2012 से लापता है।
सीबीसीआईडी के उपाधीक्षक एनसी वर्मा ने कहा है कि इस मामले की जांच मानवाधिकार आयोग के निर्देश पर मेरठ के स्थान पर बरेली ब्रांच को सौंपी गई है। इस मामले में चार में से तीन आरोपी गिरफ्तार हैं, सभी के बयान ले लिए हैं। महिला की तलाश होने के बाद ही इस मामले की जांच कराई जाएगी।