बरेली। होली आई चली गई। दिवाली पर भी घर रोशन नहीं हुए। जानें कितने त्योहार सूने गुजर गए, लेकिन गुमशुदा बच्चों का इंतजार खत्म नहीं हुआ। अब तो परिजनों के आंसू भी सूख चुके हैं। बस एक उम्मीद बची है कि शायद उनके बच्चे उन्हें मिल जाएं। लेकिन इस उम्मीद को सच में बदलने वाला सिस्टम तीन साल में गायब हुए तीस बच्चों को भूला बैठा है। कार्रवाई के नाम पर बस इतना किया कि गुमशुदगी दर्ज कर ली। पुलिस के ‘ब्रह्मास्त्र’ सर्विलांस सिस्टम से मदद नहीं मिली क्योंकि बच्चों के पास मोबाइल नहीं थे। ऐसे मामलों की जांच को बनाई गई विशेष इकाई भी निष्क्रिय पड़ी है।
रिकार्ड के मुताबिक, वर्ष 2017 में कुल 56 बच्चे लापता हुए। इनमें से 36 बालक और 20 बच्चियां थीं। साल के अंत तक 42 बच्चे बरामद हो गए, जबकि 14 का अभी तक पता नहीं लग सका है। इसी तरह 2018 में कुल 37 बच्चों के गायब होने का ब्योरा है। जिनमें 25 लड़के और 12 बच्चियां थीं। इनमें से 28 बच्चे मिल गए, जबकि नौ का सुराग नहीं मिल सका है। इस साल अभी तक करीब सात बच्चे लापता हैं जिनकी गुमशुदगी संबंधित थानों में दर्ज है। हालांकि यह बात अलग है कि डीसीआरबी के पास इनमें से केवल तीन का ही ब्यौरा है।
मुखबिर तंत्र फेल होने से दिक्कत
पुलिस इन लापता बच्चों को खोजने में दिलचस्पी नहीं लेती। बच्चों के पास मोबाइल न होने से तकनीकी मदद से तलाश का रास्ता बंद हो जाता है। मुखबिर तंत्र फेल होने के कारण वहां से भी कोई मदद नहीं मिल रही।
बच्चा चोर गैंग भी सक्रिय, पहले कई हुए मामले
बरेली। जिले में बच्चा चोर गैंग भी पहले काफी सक्रिय रहा है। करीब डेढ़ साल पहले चक महमूद में विजय नाम के व्यक्ति को चार बच्चे चोरी करते हुए पकड़ा गया था। वो किस रैकेट के लिए काम करता था, ये बारादरी थाना पुलिस आज तक मालूम नहीं कर सकी। शाहदाना मजार से बच्चा चोरी होने के बाद कैंट निवासी महिला रानी के पास से उसे बरामद किया था। पुलिस ने उस वक्त बच्चे को मां के हवाले कर रानी के खिलाफ रिपोर्ट भी लिखी। लेकिन रानी किसके लिए काम करती थी, पुलिस नहीं उगलवा सकी। रानी का कहना था कि बच्चा उसे भटकता हुआ मिला तो वह घर ले आई। वर्ष 2014 में जिला अस्पताल में एक महिला को बच्चा चोरी करते पकड़ा था। इस मामले में महिला की पैरवी करने वाले एक नेता का नाम भी सामने आया था पर पुलिस ने बच्चा बरामद करने के बाद विवेचना बंद कर दी।
सजायाफ्ता लोगों की आरामगाह बनी एएचटीयू
बाल तस्करी और देह व्यापार पर रोक लगाने के लिए शासन स्तर से पांच साल पहले हर जिला मुख्यालय पर एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट खोली गई थी। यहां भी एसएसपी कार्यालय में ऐसी ही इकाई है। कहने को यहां जीडी, मुंशी से लेकर थाने जैसी हर व्यवस्था मौजूद है, लेकिन उपलब्धि कोई नहीं है। बच्चों की गुमशुदगी के बरसों पुराने दो-तीन केस की विवेचना यहां चल रही है। यूनिट अपनी ओर से कोई अभियान या कार्रवाई नहीं करती और न ही कोई नया मामला दर्ज करती है। यहां केवल थानों से ट्रांसफर मामले ही आते हैं। स्टाफ अक्सर छुट्टी या अन्य तरह की ड्यूटी पर रहता है। महीने भर से इकाई प्रभारी प्रशिक्षण पर गए हुए हैं।
‘थानों में दर्ज गुमशुदगी के पुराने मामलों को नियमानुसार एक अवधि के बाद एएचटीयू में आ जाना चाहिए और वहां उनकी विशेष तरीके से जांच होनी चाहिए। उनके संज्ञान में भी आया है कि ऐसा नहीं हो रहा। किसी गुमशुदगी दर्ज करती है, लेकिन मामलों में ढील दी जा रही है। अब ऐसा नहीं होगा। क्षेत्र के सभी सीओ व एएचटीयू प्रभारी के साथ जल्द ही बैठक करके बच्चों की तलाश तेज करने को संयुक्त रूप से रणनीति बनाएंगे।’
- एसपी सिटी अभिनंदन सिंह