बरेली। जून की भीषण गर्मी में 12 फुट लंबे और बमुश्किल 6-7 फुट चौड़े कमरे में 23 लड़कियां ठुसी हुई हैं। कमरे में सिर्फ दो पंखे है, वह भी सिर्फ एक तरफ लगे हुए हैं। सोने के लिए फर्श है और खाने के लिए कुछ भी नहीं। कमरे में टॉयलेट है जिसकी बदबू अंदर भरी रहती है मगर लड़कियां इसकी आदी हो चुकी हैं। सिस्टम का यह बर्ताव उन लड़कियों के साथ है, जो अगवा होने के बाद पुलिस के हाथों बरामद हुईं और फिर रखने के लिए यहां भेज दी गईं। कहने को ये पीड़ित है लेकिन इनके साथ सलूक मुल्जिमों से भी बदतर किया जा रहा है। न पुलिस खुद को उनके साथ इस बर्ताव के लिए जिम्मेदार मानने को तैयार है न अस्पताल प्रशासन।
अपहृत लड़कियों की बरामदी होने पर मेडिकल परीक्षण और कोर्ट में बयान होने तक उन्हें संबंधित थाने या महिला थाने में रखा जाता था। दो साल पहले शासन ने आदेश जारी कर पीड़ित लड़कियों या महिलाओं को थाने में रखने पर रोक लगा दी थी। तब से इनके लिए जिला अस्पताल में इमरजेंसी वार्ड के ऊपर एक कमरा निर्धारित कर दिया गया। इस एक कमरे में जिले भर की लड़कियों को रखा जाता है। पिछले एक सप्ताह से यहां 23 लड़कियां रह रही हैं। यहां रुकने वाली लड़कियों की हालत जेल से भी बदतर है। इन लड़कियों के खाने, पीने की कोई व्यवस्था नहीं है। सोने के लिए केवल फर्श है। कमरे में दो बेड पड़े हैं, जिन पर महिला सिपाही सोती हैं। कमरे में एक तरफ दो पंखे लगे हैं, जबकि दूसरी ओर पंखा भी नहीं है। कमरे के अंदर ही शौचालय है, जिसकी सफाई न होने से बदबू निकलती रहती है। रात को मुख्य गेट बंद होने जाने पर गर्मी में और भी बुरा हाल हो जाता है। इस भीषण गर्मी में लड़कियां ही हीं उनके साथ रहने वाली सिपाही भी परेशान हैं। लड़कियों का कहना है कि उनकी दुर्दशा देखने वाला कोई नहीं। शिकायत भी करें तो किससे? मेडिकल परीक्षण कराने से लेकर कोर्ट से आदेश जारी होने तक डेढ़ से दो महीने तक लग जाते हैं। तब तक लड़कियों को यही नर्क झेलना पड़ता है। कई लड़कियां तो बीमार हो गई हैं।
आशा ज्योति केंद्र के दरवाजे भी बंद
पीड़ित लड़कियों और महिलाओं को एक छत के नीचे सारी सुविधाएं देने लिए प्रदेश के हर जिले मे आशा ज्योति केंद्र खोले गए थे। यहां आशा ज्योति केंद्र जिला महिला अस्पताल में खुलना था, लेकिन बाद में तीन सौ शैय्या वाले नए अस्पताल में शिफ्ट कर दिया गया। जिला अस्पताल में रुकने वाली लड़कियों के लिए आशा ज्योति केंद्र भी बेमानी है। खास बात यह कि इन लड़कियों की समस्या सुनने के लिए कोई अधिकारी तय नहीं है।
एक दूसरे पर डाल रहे जिम्मेदारी
‘इन लड़कियों को जिला महिला अस्पताल में रखा जाना चाहिए। तत्कालीन सीएमओ ने इमरजेंसी के ऊपर वाला कमरा दे दिया था। इन्हें केवल मेडिकल परीक्षण होने तक रखा जाना चाहिए। ज्यादा दिन रखने से कई बार झगड़े हो चुके हैं। इसे शिफ्ट करने के लिए बैठक में आला अफसरों से कहा जा चुका है। रही बात सुविधाओं की तो इसे पुलिस को देखना चाहिए।
केएस गुप्ता, सीएमएस जिला अस्पताल
‘शासनादेश के मुताबिक पीड़ित लड़कियों को थाने में नहीं रखा जा सकता। इसलिए उन्हें मेडिकल परीक्षण और कोर्ट में बयान होने तक जिला अस्पताल में रखा जाता है। चाहें तो परिवार वाले अपने साथ भी ले जा सकते हैं। लड़कियों को कोई दिक्कत है तो अस्पताल वालों को देखना चाहिए।’
- कुलदीप कुमार, सीओ सिटी प्रथम