पलियाकलां (लखीमपुर खीरी)। दुधवा नेशनल पार्क के डिप्टी डायरेक्टर मनोज कुमार सोनकर पर दर्ज छेड़छाड़ और एससी/एसटी एक्ट की रिपोर्ट विवेचना के बाद निराधार पाते हुए पुलिस ने निरस्त कर दी है। गौरीफंटा कोतवाली में थारू महिला की तहरीर पर संगीन धाराओं में डीडी के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज की गई थी। पुलिस की जांच में आरोप गलत पाए गए।
एक अगस्त को गौरीफंटा रेंज में दो बकरियों और एक ग्रामीण को गश्त के दौरान पार्क कर्मी ले गए थे। कार्रवाई के दौरान डीडी मनोज सोनकर भी थे। बाद में वह कीरतपुर बीट में गश्त के लिए चले गए। वहां से लौटते समय कार्रवाई से गुस्साए ग्रामीणों ने सेड़ा-बेड़ा में रास्ते पर बांस-बल्लियां लगाकर रास्ता बंद कर दिया था। मामले में पार्क कर्मियों और ग्रामीणों के बीच तनातनी भी हुई थी। इस मामले में एक महिला की तहरीर पर गौरीफंटा कोतवाली पुलिस ने 21 अगस्त को दुधवा नेशनल पार्क के डिप्टी डायरेक्टर मनोज सोनकर समेत अन्य पर छेड़छाड़, एससी/एसटी एक्ट समेत अन्य धाराओं में रिपोर्ट दर्ज की थी। पुलिस की जांच व विवेचना में डीडी पर लगाए गए सभी आरोप गलत और निराधार पाए गए। जिसपर पुलिस ने एफआईआर निरस्त कर दी है। पुलिस के मुताबिक डीडी के अनुसार उक्त महिला वहां मौजूद नहीं थी। पड़ताल पर यह बात साबित हुई है जिसके बाद ही एफआईआर को निरस्त किया गया है।
मामले में जांच की गई तो डीडी पर लगे आरोप निराधार पाए गए हैं। जिसके बाद एफआईआर को निरस्त करने की कार्रवाई की गई है।
-कुलदीप कुकरेती, सीओ पलिया
वन माफिया और अराजक तत्वों द्वारा एफआईआर का तरीका ईजाद किया गया है जो गलत है। यह अधिकारियों को हतोत्साहित करता है। वन माफिया का उद्देश्य रहता है कि वे कटान, शिकार आदि आसानी से कर सकें और अधिकारी उनपर कोई कार्रवाई न करें। जिस महिला ने एफआईआर दर्ज कराई थी वह वहां पर मौजूद ही नहीं थी। वीडियो, फोटो समेत सारे सुबूत हैं जिसके तहत ही यह एफआईआर निरस्त की गई है। फर्जी तरीके से अगर कोई कार्य किया जाए तो जांच में सब सामने आ जाता है।
-मनोज कुमार सोनकर, डिप्टी डायरेक्टर, दुधवा नेशनल पार्क
रिपोर्ट निरस्त होने से थारू समुदाय में रोष
थारू समुदाय के लोग डीडी दुधवा पर दर्ज हुई रिपोर्ट निरस्त होने पर पुलिस पर सवाल उठा रहे हैं। पुलिस पर एकतरफा कार्रवाई का आरोप लगाते हुए थारू समुदाय के लोगों का कहना है कि इससे वन विभाग उन पर हावी होगा।
दुधवा नेशनल पार्क के डीडी मनोज सोनकर पर एक महिला की ओर से छेड़छाड़, एससीएसटी एक्ट समेत कई धाराओं में मुकदमा दर्ज कराया गया था। इसके बाद पुलिस ने जांच व विवेचना में डीडी पर लगाए गए सभी आरोपों के निराधार मिलने का दावा करते हुए एफआईआर निरस्त कर दी। डीडी पर रिपोर्ट निरस्त होने की खबर जब थारू गांवों में पहुंची तो वहां पर लोगों में आक्रोश दिखाई दिया। थारू समुदाय ने इस मामले को उच्चस्तरीय जांच की मांग की है।
थारू गांव की निबादा राणा, अनीता राणा, प्रताप सिंह, सहवनिया राणा ने कहा कि रिपोर्ट निरस्त होने से पता चलता है कि यह काम आधिकारिक दबाव में हुआ है, लेकिन इसका मतलब ये कतई तौर पर न लगाया जाए कि वनाधिकार का मुद्दा भी कमजोर पड़ जाएगा। वन विभाग को आज नहीं तो कल अपनी सीमाएं तय करनी ही होंगी। केंद्रीय विशिष्ट वनाधिकार कानून के नियमों के अनुसार वनाश्रित समुदायों के अधिकारों को स्वीकार करना ही पड़ेगा।
निबादा राणा, अनीता राणा आदि ने कहा कि दुधवा उपनिदेशक कानून का विधिवत अध्ययन करें और यह कहने से बचें की कोर जोन में कानून लागू नहीं होगा। शायद उनको नहीं पता कि सन 2011 में सरकार की पहल पर वनाधिकार कानून के तहत ही यहां कोर जोन में बसे गांव सूरमा को वनाधिकार कानून के तहत ही राजस्व का दर्जा दिया गया था।