बरेली। अदालतों में सबूतों और गवाहों के बयानों पर फैसले होते हैं, लिहाजा अभियोजन पक्ष की एक भी चूक सीधे फैसले पर असर डालती है। शीशगढ़ के हाफिज नूर मोहम्मद के साथ उनकी पत्नी, बेटे और बेटी की हत्या के आरोपी पुलिस की लचर विवेचना और कमजोर पैरवी से आरोपी कोर्ट से बेदाग छूट गए।
शीशगढ़ के दर्जी चौक मोहल्ले में 18 फरवरी 1999 की रात दिव्यांग हाफिज नूर मोहम्मद, उनकी पत्नी खातून बेगम, उनकी बेटी अंजुम उर्फ बबली और बेटे खालिद की घर में सोते समय गला दबाकर हत्या कर दी गई थी। लोगों को इस वारदात की जानकारी 19 फरवरी की सुबह तब हुई जब नूर मोहम्मद की विवाहित बेटी तरन्नुम घर पहुंची। इस वारदात से पूरा शीशगढ़ कस्बा दहल गया था। बरेली जोन के आईजी रहे उदयन परमार कई आला अफसरों के साथ खुद घटना स्थल पर पहुंचे थे। नूर मोहम्मद का दूसरा बेटा नाहिद नूर अलीगढ़ में पढ़ता था। वारदात के समय घर में न होने से नाहिद नूर और उसकी विवाहित बहन तरन्नुम की जान बच गई थी। पुलिस ने तरन्नुम की ओर से अज्ञात हत्यारों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज की थी। पांच दिन बाद पुलिस ने घटना का खुलासा करने का दावा करते हुए शीशगढ़ के ही तकिया मोहल्ला में रहने वाले जुल्फिकार अहमद पुत्र हुजुर अहमद, उसके दोस्त फैजान, नवाब उर्फ जलालुद्दीन और जुल्फिकार पुत्र छोटे खां को गिरफ्तार करके जेल भजा था। खुलासे के समय पुलिस ने जो कहानी बताई थी उसके अनुसार नूर मोहम्मद ने अपनी बड़ी बेटी तबस्सुम का रिश्ता जुल्फिकार पुत्र हुजूर अहमद से तय किया था। जुल्फिकार और उनके चचेरे मामा मंजूर अहमद के बीच तनातनी चल रही थी। मंजूर अहमद के कहने पर नूर मोहम्मद ने शादी का रिश्ता तोड़ दिया था। रिश्ता टूटने से जुल्फिकार ने खुद को अपमानित महसूस किया।
इस हत्याकांड की विवेचना उस दौरान थानाध्यक्ष रहे कमल सिंह ने शुरू की थी और कई गवाहों के बयान दर्ज किए। इनमें मुख्य गवाह मंजूर अहमद थे। कई सबूत जुटाने के बाद पुलिस ने चार्जशीट कोर्ट में दाखिल की थी। घटना के समय नूर मोहम्मद का छोटा बेटा नाहिद नूर 12 वर्ष का था। घर में दूसरा कोई बड़ा था नहीं। मंजूर अहमद इस हत्याकांड में मुख्य गवाह होने के साथ केस की पैरवी भी करते थे। अदालत में केस की सुनवाई के दौरान ही मंजूर अहमद का इंतकाल हुआ तो केस की पैरवी भी कमजोर हो गई। गवाहों की गवाही पुलिस ने विवेचना के दौरान दर्ज किए बयानों के अलग रही। इसका फायदा आरोपियों को मिला और और वर्ष 2011 में कोर्ट का फैसला आने पर जुल्फिकार अहमद पुत्र हुजुर अहमद, फैजान, नवाब उर्फ जलालुद्दीन और जुल्फिकार पुत्र छोटे खां बेदाग छूट गए।
नहीं निकल पाई नाहिद के दिल में बैठी दहशत
माता-पिता की हत्या के बाद नाहिद नूर की पढ़ाई छूट गई। उनकी परवरिश रिश्तेदारी में हुई। बड़े होने पर डर की वजह से नाहिद नूर नेपाल चले गए और वहीं कारोबार शुरू कर दिया। हालांकि उनकी पत्नी शीशगढ़ में रहती रहीं। कोर्ट का फैसला आने के बाद नाहिद और दहशत में आ गए। वह पत्नी और बच्चों को भी अपने साथ नेपाल ले गए। मगर वहां कारोबार में घाटा हो गया, जिससे मजबूर होकर उन्हें शीशगढ़ लौटना पड़ा। नाहिद दूर का कहना है कि माता-पिता और भाई-बहन की हत्या से उनके दिल में बैठी दहशत अभी तक नहीं निकल पाई है। वह ज्यादा लोगों से वास्ता नहीं रखते। केवल काम से बाहर निकलते हैं। बच्चों का भी खास ध्यान रखते हैं।