सुप्रीम कोर्ट के तीन तलाक पर रोक के आदेश के बाद शरई अदालतों पर संकट खड़ा हो गया है। दारुल इफ्ता और दारुल कजा के नाम से स्थापित शरई अदालतों में तलाक के मुद्दे पर लोग इस्तिफता (सवाल) कर रहे हैं मगर मुफ्तियाने इकराम जवाब देने से बहुत हद तक बच रहे हैं। यह स्थिति सभी दारुल इफ्ता और दारुल कजा की है।
इसकी वजह यह कि अगर तीन तलाक पर पूछे गए सवाल का जवाब दिया जाता है तो शरीयत (कुरान हदीस) की रोशनी में यही फतवा दिया जाएगा कि तलाक वाके हो गई। (यानी एक बार में तीन तलाक मानी जाएगी), लेकिन ऐसा करना सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन भी होगा। लिहाजा मुफ्तियों को यह फिक्र सताती रहती है कि कहीं पूछने वाला (प्रश्नकर्ता) कोर्ट में फतवे को ले जा कर मुकदमा न कर दे। ऐसा होने पर दारूल इफ्ता या दारुल कजा के मुंतजिम और मुफ्ती को न्यायालय में तलब किया जा है। संकट इस बात का है कि शरई अदालतों और सुप्रीम कोर्ट के बीच सामंजस्य कैसे बनाया जाए। फिलहाल दारुल इफ्ता और दारुल कजा में आने वाले तलाक के मसलों को टाला जा रहा है। इस बात का इंतजार है कि संसद इस पर क्या कानून बनाती है।
बरेली मरकज में स्थापित शरई अदालतें
मरकजी दारुल इफ्ता
दारुल इफ्ता मंजर-ए-इस्लाम
रजवी दारुल इफ्ता
दारुल इफ्ता जाम-ए-नूरिया
इस वक्त कोई फैसला कर पाना खासा मुश्किल काम है। हम इस बात का इंतजार कर रहे हैं कि हुकूमत क्या निर्णय लेती है। चूंकि शरई मामलात अपनी जगह अटल हैं। ऐसी सूरत में असमंजस की स्थिति है। - मौलाना शहाबुद्दीन रजवी, राष्ट्रीय महासचिव तंजीम उलमा इस्लाम
ये गंभीर मामला है। इस पर बहुत जल्द देश भर के उलमा और मुफ्तियाने इकराम के बीच विचार-विमर्श किया जाएगा। हम लोग काफी फिक्रमंद हैं और चाहते हैं कि मसले का हल होना चाहिए, जो शरीयत के दायरे में हो। - मुफ्ती फारूख शमसी, दारुल उलूम रजविया