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भागदौड़ से टूट गया परिवार.. पुलिस और वकीलों ने किया बेड़ा पार

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पुलिस ने साक्ष्य और गवाह जुटाने में कोई कसर नहीं छोड़ी तो वकीलों ने पैरवी में लगाया पूरा दम
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डीजीसी ने कहा- निर्भया से भी जघन्य बर्ताव किया गया नवाबगंज की पीड़िता के साथ
बरेली। लगातार तारीखों पर भागदौड़ से मेहनत-मजदूरी करने वाला पीड़ित बच्ची का परिवार हताश था तो अभियुक्तों के पक्ष के दबाव ने भी उसका हौसला तोड़ दिया। नतीजा यह हुआ कि कुछ ही महीनों बाद वह इस कैस में पैरवी करने से हाथ खींचने लगा। लेकिन इसके बाद पुलिस और सरकारी वकीलों ने मिसाल पेश की। साक्ष्यों को वैज्ञानिक अनुसंधान कराकर मजबूत किया गया जो अदालत के लिए किसी नतीजे पर पहुंचने के लिए अहम जरिया बने।
डीजीसी क्राइम सुनीति कुमार पाठक ने सजा का 41 पन्नों का आदेश सुनाते हुए स्टाफ के साथ पुलिस को भी बधाई दी। उन्होंने इसे दिल्ली के निर्भया कांड से भी जघन्य अपराध करार देते हुए कहा कि दिल्ली दुष्कर्म कांड की पीड़ित बालिग थी लेकिन नवाबगंज में 12 साल की बच्ची के साथ हैवानियत की हदें पार की गईं। बच्ची अनुसूचित जाति के गरीब परिवार की थी और आरोपियों का ताल्लुक पिछड़ी जाति के प्रभावशाली परिवारों से था। उन्होंने केस को प्रभावित करने के लिए साम-दाम के साथ हर हथकंडा अपनाया। हालात ऐसे बन गए कि बच्ची के घरवालों ने पैरवी ही छोड़ दी। उन्होंने इस प्रकरण में पुलिस की तारीफ करते हुए कहा कि पुलिस ने बिना प्रभावित हुए पीड़ित के हक में फर्ज निभाया।
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पॉक्सो कोर्ट के एडीजीसी रीतराम राजपूत ने बताया कि पुलिस ने आरोपियों के कपड़ों के साथ छिपाई गई पीड़िता की सलवार से नमूने लेकर लखनऊ लैब भेजे थे। बच्ची के प्राइवेट पार्ट में डाली गई सरसों की लकड़ी पर लगे पदार्थ से भी सामूहिक दुष्कर्म की पुष्टि हुई। प्राइवेट पार्ट पर करीब दस चोटें पाई गईं और हाइमन भी फटी मिली जिसने इसे गंभीरतम अपराध साबित किया। लगातार चार दिन चली बहस के बाद अदालत ने फैसला सुरक्षित कर लिया। उन्हें पहले से उम्मीद थी कि बच्ची के गुनहगारों को फांसी से कम सजा नहीं होगी।
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