पीलीभीत। जिले की तीन सहकारी चीनी मिलों में से एक मझोला मिल तो घाटे का बोझ उठाने में नाकाम रहने पर बंद हो चुकी है। बाकी दो मिलें बीसलपुर और पूरनपुर भी इस कदर घाटे में डूब चुकी हैं कि इनका भविष्य भी अंधकारमय ही नजर आ रहा है। दोनों मिलें चलने के नाम पर बस किसी तरह घिसट रही हैं। हालात ये हैं कि पुरानी जर्जर हो चुकी मशीनों और कम पेराई क्षमता के चलते इनके घाटे से उबरने की उम्मीद भी न के बराबर है। घाटे की खाई पटने के बजाय साल-दर-साल और चौड़ी होती जा रही है। इन मिलों के विस्तारीकरण की बात तो हर साल उठती है, लेकिन इस पर अमल नहीं हो पा रहा है।
बीसलपुर चीनी मिल को 80 करोड़ का घाटा
बीसलपुर। चीनी मिल के पिछले पेराई सत्र की बैलेंस सीट बनकर तैयार हो गई है। इसके अनुसार मिल को पिछले पेराई सत्र में 80 करोड़ का घाटा हुआ है। इस घाटे को मिलाकर मिल अब करीब छह अरब के घाटे में पहुंच चुकी है।
किसान सहकारी चीनी मिल की स्थापना वर्ष 1975 में हुई थी। वर्ष 1988 तक मिल काफी मुनाफे में रही। वर्ष 1988 में इस मिल को सर्वाधिक चीनी उत्पादकता का पुरस्कार भी मिल चुका है। वर्ष 1989 में इस मिल को ऐसी नजर लगी कि घाटा होने लगा। उसके बाद से मिल अभी तक घाटे से नहीं उबर पाई है। वर्ष 1989 से वर्ष 2017 तक इस मिल को करीब पांच अरब का घाटा हो चुका है। वर्ष 2018 में इस मिल ने करीब 34 लाख क्विंटल गन्ने की पेराई की और तीन लाख सोलह हजार बोरी चीनी का उत्पादन किया। मिल के जीएम एसडी सिंह ने बताया कि वर्ष 2018 के पेराई सत्र में बैलेंस सीट बनकर तैयार हो गई हेै। बैलेंस सीट को फेडरेशन कार्यालय लखनऊ के अधिकारियेा ने भी सत्यापित कर दिया है। जीएम ने बताया कि तैयार हुई बैलेंस सीट के अनुसार चीनी मिल को बीते पेराई सत्र में लगभग 80 करोड़ का घाटा हुआ है। इस घाटे को मिलाकर मिल को अब तक 5.80 अरब का घाटा हो चुका है। जीएम ने बताया कि बीेते पेराई सत्र में मिल को 80 करेाड़ का घाटा होने की लिखित सूचना डीएम वैभव श्रीवास्तव को भी दे दी गई है। जीएम ने स्पष्ट किया है कि मिल की मशीनरी काफी पुरानी है, जिसमें पेराई सत्र के दौरान आए दिन तकनीकी खराबियां आती रहती हैं। उन तकनीकी खराबियों को सही कराने में काफी खर्चा आ जाता है। आए दिन तकनीकी खराबी आने के कारण मिल कई कई दिन बंद रहती है, इसके अलावा रिकवरी डाउन रहती है। इसके अलावा मिल के चार गन्ना क्रय केंद्र काफी ज्यादा दूरी पर हैं, जहां गन्ना खरीदने और गन्ने को मिल तक लाने में मिल को क ाफी ज्यादा खर्चा करना पड़ता है। इन विपरीत हालातों के चलते मिल का खर्चा काफी ज्यादा है और आमदनी काफी कम। इसी वजह से मिल को लगातार घाटा हो रहा है।
साढ़े पांच अरब के घाटे में चल रही पूरनपुर चीनी मिल
पूरनपुर। दि किसान सहकारी चीनी मिल पिछले लंबे अरसे से घाटे में चल रही है। मिल के लगातार घाटे में रहने के चलते इस पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। गन्ना उत्पादन क्षेत्र में अग्रणी तहसील के किसानों की यह सोचकर चिंताएं बढ़ रही हैं कि कहीं चीनी मिल बंद न हो जाए। इस संबंध में चीनी मिल के जीएम वीपी पांडे ने बताया कि चीनी मिल करीब साढ़े पांच अरब के घाटे में चल रही है।
160 करोड़ के घाटा में पहुंचकर बंद हो गई मझोला चीनी मिल
160 करोड़ रुपये के घाटे के चलते वर्ष 2009 में मझोला किसान सहकारी मिल बंद हो गई। जहां एक ओर क्षेत्रीय किसान गन्ने के उत्पादन पर जोर दे रहे हैं वहीं दूसरी ओर कई वर्षों से बंद पड़ी चीनी मिल के चलते उनको मेहनत का फल नहीं मिल पा रहा है। इसके चलते किसानों को गन्ना बिक्री में खासी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। हालांकि पूर्व में चीनी मिल चलाने के लिए कैबिनेट ने चार सौ करोड़ के निवेश को मंजूरी दी है। चीनी मिल के प्रभारी जीएम वीपी पांडे ने बताया कि मझोला चीनी मिल करीब 160 करोड़ के घाटे में है। हालांकि सरकार इस मिल को फिर से चलाने के प्रयास कर रही है, लेकिन अब तक इनमें सफलता मिलती नहीं दिख रही है।