बरेली। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ओंकारनाथ शास्त्री का सोमवार रात दो बजे निधन हो गया। उनका अंतिम संस्कार मंगलवार को सिटी श्मशान भूमि में हुआ, जहां उत्तराखंड के गदरपुर से अधिकारी गार्ड ऑफ ऑनर देने पहुंचे। स्थानीय तहसीलदार, लेखपाल और इंस्पेक्टर किला भी मौजूद रहे लेकिन जनप्रतिनिधि नजर नहीं आए।
पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के सहपाठी रहे शीर्ष स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बृज मोहन लाल शास्त्री के बड़े बेटे ओंकारनाथ शास्त्री भी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। बड़ा बाजार स्थित मिर्धान गली निवासी 80 वर्षीय ओंकारनाथ शास्त्री को सोमवार रात करीब एक बजे दिल का दौरा पड़ा। बेटे अनिल शास्त्री उन्हें लेकर निजी अस्पताल पहुंचे, जहां डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया। देश की आजादी में महती भूमिका निभाकर बरेली को गौरवान्वित करने वाले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के निधन की सूचना से शहर में शोक की लहर दौड़ गई। मूल रूप से रुद्रपुर के गदरपुर निवासी ओंकारनाथ शास्त्री के निधन की सूचना उत्तराखंड प्रशासन को भी दी गई। वहां से डीएम के प्रतिनिधि के तौर पर एसडीएम गदरपुर बरेली पहुंचे। स्थानीय तहसीलदार आशुतोष गुप्ता के साथ उन्होंने ओंकारनाथ शास्त्री को गार्ड ऑफ ऑनर देकर अंतिम यात्रा के लिए विदाई दी। तिरंगे लिपटा उनका शव सिटी श्मशान भूमि के लिए रवाना हुआ सैकड़ों क्षेत्रवासी भी अंतिम विदाई देने पहुंचे। मगर इस दौरान कोई भी स्थानीय जनप्रतिनिधि नजर नहीं आया।
आजादी की लड़ाई के बाद सरकार से खुद के लिए लड़े
बरेली। अंग्रेजों के जुल्म सहते हुए क्रांतिकारियों का साथ निभाने वाले ओंकार नाथ शास्त्री को करीब 4 वर्षों तक अपने हक की लड़ाई भी लड़नी पड़ी। इसके बाद साल 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का दर्जा देने के लिए केंद्र सरकार को आदेशित किया। सुप्रीम आदेश के बाद सरकार को आजादी के इस रहनुमा के सामने घुटने टेकने पड़े।
बेटे अनिल कुमार शास्त्री के मुताबिक दादा बृजमोहन शास्त्री का देहांत होने के बाद पिता उत्तराखंड चले गए। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी को मिलने वाली सारी सुविधाएं वहां मिलीं, लेकिन केंद्र सरकार ने स्वतंत्रता सेनानी मानने से इनकार कर दिया। इसके बाद उन्होंने वर्ष 2008 में हाईकोर्ट में केस किया। वर्ष 2009 में उन्हें जीत मिल गई, लेकिन केंद्र ने हाईकोर्ट के फैसले को नहीं माना तो वह सुप्रीम कोर्ट चले गए। वर्ष 2009 में ही उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। 14 सितंबर 2011 को आया फैसला उनके हक में था, इसके बाद केंद्र सरकार को उन्हें स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का दर्जा देना पड़ा।
दिखावा है नेताओं की देशभक्ति
अनिल शास्त्री के मुताबिक, उनके पिता कहते थे कि अब नेताओं में देशभक्ति नहीं सिर्फ दिखावा है। आजादी के दौरान भी बरेली के मोती पार्क में मुस्लिम लीग के नेता लियाकत अली खां देश के बंटवारे की बात करते थे। कहते थे, बरेली की सड़कों को पाकिस्तान रोड के नाम से जाना जाएगा। पिता कहते थे कि दोनों कौम को यह समझना होगा कि हिन्दू मुस्लिम भाई-भाई हैं, राजनीति के मोहरे नहीं।
क्रांतिकारी की अधूरी ख्वाहिश
ओंकारनाथ शास्त्री पिता बृजमोहन शास्त्री की प्रतिमा शहर के किसी पार्क में लगवाना चाहते थे, ताकि लोग क्रांतिक ारियों से प्ररेणा लें और बरेली के इतिहास से परिचित हो सकें। करीब दो साल पहले उन्होंने डीएम को ज्ञापन सौंपा था। तत्कालीन डीएम ने फन सिटी के सामने पार्क में प्रतिमा लगवाने के निर्देश एनएचएआई को दिए भी थे। साल भर बाद एनएचएआई ने यह काम पीडब्ल्यूडी पर टाल दिया। वह पिता की प्रतिमा के लोकार्पण का ख्वाब ही देखते रहे और निधन हो गया।
क्रांतिकारियों की करते थे सेवा
बड़ा बाजार में शास्त्री भवन गली आजादी के रहनुमाओं के नाम से मशहूर है। क्योंकि स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ओंकार नाथ शास्त्री के पिता आंवला विधानसभा के पूर्व विधायक बृजमोहन शास्त्री महान क्रांतिकारी थे। 1932 में जन्मे ओंकारनाथ शास्त्री जब 12 वर्ष के थे तभी देश को आजाद करने के लिए कदम बढ़ा दिए थे। पिता समेत जेल में बंद थे तो वह अन्य क्रांतिकारियों को खाना पहुंचाते थे। लगातार 6 वर्षो तक यह क्रम जारी रहा, वर्ष 1947 में देश आजाद होने के बाद ही यह सिलसिला थमा।