बरेली। सिविल एंक्लेव और एयरफोर्स कैंपस के बीच टैक्सी वे की लीज के लिए एनओसी मिले करीब चार माह से अधिक समय गुजर चुका है, लेकिन अब तक एयरपोर्ट अथॉरिटी ने रक्षा विभाग को पांच वर्ष की लीज का किराया करीब एक करोड़ रुपए का भुगतान नहीं किया है। रक्षा संपदा विभाग की ओर से भेजे गए छठे रिमाइंडर में लीज की धनराशि भुगतान न करने पर नियमानुसार कार्रवाई की चेतावनी दी गई है। बताते हैं कि बिना लीज का किराया दिए एयरपोर्ट से उड़ान भरने में पेंच फंस सकता है।
केंद्र सरकार की ओर से दो जनवरी को लीज के संबंध में एनओसी जारी की गई थी। जिसमें रक्षा भूमि संबंधी सभी गतिविधियों और लीज का किराया वसूलने की जिम्मेदारी क्षेत्रीय रक्षा विभाग कार्यालय को सौंपी गई है। जिसके अनुसार विभाग की ओर से पिछले छह माह में पांच बार रिमाइंडर भेजा जा चुका है। सूत्रों के मुताबिक भेजे गए रिमाइंडर पर एएआई के संयुक्त महाप्रबंधक ने कोई जवाब नहीं दिया है। समय से किराए का भुगतान न होने से मामले में पेंच फंसता नजर आ रहा है। ऐसे में अब छठवीं बार भेजे गए रिमाइंडर में नियमानुसार की कार्रवाई किए जाने की चेतावनी दी गई है। रक्षा विभाग ने एएआई के इस रवैए से रक्षा संपदा विभाग के उच्चाधिकारियों को भी अवगत करा दिया है।
प्रीमियम का नहीं करना है भुगतान
पूर्व में रक्षा विभाग ने नियमानुसार 5 वर्ष की लीज के मूल किराये एक करोड़ रुपए में प्रीमीयम धनराशि के एक करोड़ रुपए भी जोड़े थे। एएआई को करीब दो करोड़ रुपये का भुगतान करना था। बाद में एएआई ने जनहित को देखते हुए रक्षा विभाग से प्रीमियम खत्म करने को पत्र लिखा था। जिस पर उच्चाधिकारियों की संस्तुति के बाद प्रीमियम राशि एक करोड़ रुपए कम कर दी गई। किराया आधा होने के बाद अब एएआई को 1,00,80,470 रुपए ही भुगतान करना है।
एनओसी के बगैर कैसे उड़ेगा प्लेन
सूत्रों के मुताबिक जनवरी माह में टैक्सी वे निर्माण कार्य के लिए रक्षा मंत्रालय ने वर्किंग ऑर्डर दिया है। टैक्सी वे के निर्माण कार्य पर कोई अडंगा नहीं है, लेकिन उड़ान के लिए एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया को नियमानुसार एनओसी चाहिए। शर्त है कि एनओसी से पहले पूर्व के मामले यानी लीज रेंट आदि का भुगतान होना जरूरी है। अगर भुगतान नहीं होगा तो एनओसी मिलने में पेंच फंसना तय माना जा रहा है।
‘रक्षा संपदा विभाग से रिमाइंडर प्राप्त हुआ है। जिसे उच्चाधिकारियों को प्रेषित कर दिया गया है। उड़ान प्रभावित होगी या नहीं, इस बारे में कुछ कह नहीं सकता।’
- राजीव कुलश्रेष्ठ, संयुक्त महाप्रबंधक, एएआई