बरेली। आखिरी तिथि गुजरने के बाद अफसरों ने भले ही स्वेटर वितरण शुरू कर दिया हो, लेकिन यह महज खानापूर्ति ही साबित हो रहा है। दुकानों से सस्ते दामों में खरीदकर घटिया क्वालिटी के स्वेटर वितरित किए जा रहे हैं। नियमानुसार मैरून रंग के बंटने वाले स्वेटरों के साथ जब लाल रंग के स्वेटर भी स्कूलों में पहुंचे तो शिक्षकों के साथ बच्चे ही हैरत में पड़ गए। शिक्षकों ने आशंका जताई - अगर स्वेटर वितरण के मामले की जांच की जाए तो बड़े फर्जीवाड़े का खुलासा होगा।
पिछले दो दिनों से स्कूलों में स्वेटर वितरण का कार्य शुरू हुआ है। स्कूलों में पहुंच रहे स्वेटर मैरून और लाल दो रंग के हैं और उन पर विविध कंपनियों के स्टीकर लगे हुए हैं। जो स्वेटर बांटे गए हैं वह बाजार में डेढ़ सौ रुपये तक के भाव में बिक रहे हैं। थोक रेट में खरीदने पर उनकी कीमत और भी कम है। बांटे गए स्वेटरों की गुणवत्ता भी सही नहीं है। यह स्थिति तब है जब शासन ने प्रत्येक स्वेटर के लिए दो सौ रुपये की दर निर्धारित की है। स्वेटर में अभी से धागे निकलने शुरू हो गए हैं। मामले की जानकारी होने पर शिक्षक और बच्चे दोनों ही खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। शिक्षकों ने सवा तीन लाख बच्चों के लिए निर्धारित करीब साढ़े छह करोड़ के बजट में भारी पैमाने पर खेल की आशंका जताई है।
स्वेटर पर लगाए गए कंपनी के फर्जी स्टीकर
बच्चों को वितरित स्वेटर पर लगे कंपनियों के स्टीकर भी फर्जी बताए जा रहे हैं। ओसवाल (ग्रीन पैरट वाले), ओसवाल कलेक्शन, रोशनी ओसवाल होजरी, वीपी ओसवाल, फ ाइन वूलेन स्टीकर लगे हुए हैं। बताया जाता है कि ज्यादातर स्वेटर और इनर वियर की वूलेन होजरी पर ओसवाल के फर्जी स्टीकर लगाकर बच्चों को ब्रांडेड के नाम पर घटिया स्वेटर दिए जा रहे हैं। इसके अलावा स्वेटर के साइज भी कम या ज्यादा हैं।
प्रत्येक स्कूल को 50 फीसदी सप्लाई
ग्रामीण हो या नगर क्षेत्र प्रत्येक स्कूल को अभी बच्चों की संख्या के सापेक्ष सिर्फ 50 फीसदी स्वेटर ही दिए जा रहे हैं। सिस्टम की स्थिति भांपकर शिक्षक पहले उन बच्चों को स्वेटर बांट रहे हैं, जिनके स्वेटर या तो बेकार हो चुके हैं या छात्र के पास स्वेटर नहीं है। लेकिन बाकी बच्चों को स्वेटर कब मिलेगा, यह पता नहीं। बीएसए को कॉल की गई लेकिन उनका फोन नॉट रिचेबल बताता रहा।