‘कोल्हूओं पे काम करता है बचपन, चीथड़ों से अपना ढके हुए है तन।’ कवि राम किशोर तिवारी ‘किशोर’ की यह पंक्तियां कोल्हूओं पर काम करने वाले नौनिहालों पर सटीक बैठती हैं। पढ़ने की उम्र में यह बच्चे गन्ने के कोल्हूओं पर मजदूरी करने में अपना बचपन गवां रहे हैं।
इनकी यह स्थिति बाल श्रम विद्यालयों के संचालन के हकीकत बयां कर रही है।
पृथ्वीपुर नवदिया में गन्ने की पेराई के लिए करीब दर्जन कोल्हू लगाए गए हैं। इन पर बड़ों के साथ ही काफी संख्या में बच्चे भी काम करते हैं। शुक्रवार को अमर उजाला प्रतिनिधि ने कई कोल्हूओं की हकीकत देखी तो नौनिहालों की बदहाली बयां करती तस्वीर सामने आई।
यहां आठ से बारह साल तक बच्चे मजदूरी करते मिले। एक कोल्हू पर बढे़पुरा धमीपुर के जोगराज का आठ साल का बेटा विशाल और 10 साल का निर्देश गन्ने की खोई सुखाते मिले। पढ़ाई के विषय में पूछने पर बच्चों ने बताया कि वह स्कूल नहीं जाते हैं। यहीं रहकर कोल्हू पर काम करते हैं। वहीं दूसरे कोल्हू पर आधा दर्जन बच्चे पीपा साफ करते और पानी भरकर कोल्हू ले जाते नजर आए।
आठ साल की रेशमा ने बताया कि वह कांधरपुर बरेली की रहने वाली है। अपने मां-बाप के साथ आई हूं और कोल्हू पर खोई सुखाने व पानी पहुंचाने का काम करने साथ भट्टी झोंकने का काम करती हूं। उदरनपुर की नरगिश ने भी कुछ ऐसे ही जवाब दिए। पढ़ने की उम्र में कोल्हूओं पर काम करने वाले बच्चों के लिए सर्व शिक्षा अभियान, बाल श्रम स्कूल सहित शिक्षा विभाग की विभिन्न योजनाएं बेमानी साबित हो रही हैं।
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बच्चों से काम नहीं करवाते
कोल्हू स्वामी जवाहर लाल और बब्लू ने बच्चों से काम करवाए जाने की बात से इन्कार किया है। उन्होंने बताया कि मजदूर अपने परिवार के साथ यहां रहते हैं। लेकिन, उनके बच्चों से कोई काम नहीं करवाया जाता है।
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वर्जन
बाल श्रम अपराध है। अगर बच्चों से कहीं श्रम करवाया जा रहा है तो उसकी जांच करवाई जाएगी। दोषी के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी।-राजेश कुमार, उप श्रमायुक्त, बरेली।