फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

परखिए.. कहीं आपका बच्चा तो डिस्ऑर्डर का शिकार नहीं

Tue, 05 Dec 2017 01:38 AM IST
बरेली।
विज्ञापन
विज्ञापन
 शरारत न हों तो फिर बचपन ही क्या लेकिन शरारतें ऐसी न हों जिनसे दूसरों को तकलीफ हो और उससेे आपका बच्चा खुश होता है। ये शरारत नहीं बल्कि बीमारी है। इसे मनोचिकित्सकों की भाषा में कंडक्ट डिस्ऑर्डर कहा जाता है। लिहाजा बच्चों की शरारतों को उनके बचपन की सामान्य हरकतें समझकर नजरअंदाज न करें। मनोचिकित्सकों के मुताबिक शुरुआत में झूठ बोलना, चोरियां करना, दूसरों को नुकसान पहुंचाना आदि गंभीर डिस्ऑर्डर के  लक्षण हैं। अगर सही समय पर ऐसे बच्चों की काउंसलिंग और इलाज न कराया जाए तो वे आगे चलकर अपराधी बन सकते हैं। डॉक्टर रामपुर गार्डन में घरों के बाहर खड़ी होने वाली कारों के शीशे तोड़ने वाले बड़े घरों के बच्चों के भी कंडक्ट डिस्आर्डर से ग्रसित होने का अंदेशा जता रहे हैं।  
विज्ञापन

जिला अस्पताल के मनोचिकित्सक आशीष कुमार के मुताबिक बच्चे के दस साल की उम्र से डिस्ऑर्डर से ग्रसित होने की आशंका रहती है। पहली स्टेज पर इसको अपोजिशनल डिफाइंड डिस्आर्डर के नाम से जाना जाता है। इस स्टेज पर बच्चे सिर्फ मजे के लिए दूसरों को नुकसान पहुंचाते हैं। 13 से 14 साल तक इलाज न होने पर इसकी दूसरी स्टेज कंडक्ट डिस्आर्डर की दूसरी स्टेजशुरू हो जाती है, जो इलाज न होने पर 18 साल की उम्र तक अंतिम स्टेज में एंटी सोशल पर्सनैलिटी डिस्ऑर्डर में तब्दील हो जाती है। तब इस बीमारी के शिकार बच्चे गैंग बनाकर समाज विरोधी काम करने लगते हैं। 

केस नंबर-एक 
मॉडल टाउन में रहने वाले एक व्यवसायी का 16 वर्षीय बेटा सस्ते दाम पर पिल्ले खरीदकर लाता था। उन्हें कुछ दिन पालने के बाद बड़े होने पर आठ से 12 हजार रुपये में बेच देता था। डिस्आर्डर का शिकार यह लड़का बाद में अपने ग्राहकों के घरों से उन्हीं कुत्तों को चोरी कर लाता था और फिर दूसरे ग्राहकों को बेच देता था। व्यवसायी को जब उसकी यह हरकत पता चली तो उन्होंने उसका मनोचिकित्सक से इलाज कराया। अब वह ठीक है।
विज्ञापन


केस नंबर-दो
फतेहगंज पूर्वी के एक गांव में लोगों के पशु खुलने लगे। तलाशने पर ये पशु आसपड़ोस के गांवों में मिलते। परेशान गांव वालों ने जब सुरागकशी की तो पता चला कि एक शिक्षक का 12 साल का बेटा रात में पशुओं को खोलकर पड़ोस के गांवों में छोड़ आता था। सुबह जब पशु मालिक उसे तलाशने के लिए परेशान घूमता तो खुश होता था। बच्चे का केस जब मनोचिकित्सक के पास पहुंचा तो दो महीने के इलाज के बाद वह ठीक हुआ।

डिस्आर्डर की स्टेज
10 से 12 साल की उम्र में अपोजिशनल डिफाइंड डिस्ऑर्डर। 
13 से 14 साल की उम्र में कंडक्ट डिस्ऑर्डर। 
14 से 18 साल की उम्र में एंटी सोशल पर्सनैलिटी डिस्ऑर्डर। 

बच्चों में यह लक्षण दिखें तो हो जाएं सावधान
खुद को उम्र से बड़ा समझना।
बड़ाें से सीख मिलने पर बदजुबानी करना। 
चीजों को छुपाना, झूठ बोलना, गलती न मानना। 
मजे लेने के लिए दूसरों को नुकसान पहुंचाना। 
पकड़े जाने पर भी गलती का एहसास नहीं करना। 

बच्चों में नजर आने वाले डिस्ऑर्डर की तीनों स्टेज बेहद घातक होती हैं। अभिभावक ज्यादातर मामलों में समझ ही नहीं पाते कि बच्चा ऐसा क्यों कर रहा है। सामाजिक ढांचा, अभिभावकों का व्यवहार भी ऐसे मामलों में बहुत मायने रखता है। हमारे पास आए दिन ऐसे केस पहुंच रहे हैं। उन्हें काउंसिलिंग और दवाइयों के जरिये ठीक करने की कोशिश की जा रही है। 
विज्ञापन

- खुशअदा मनोचिकित्सक, जिला अस्पताल 
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें