फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

चौबारी मेले की तो रौनक ही चली गई

Sun, 13 Nov 2016 01:06 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, बरेली
विज्ञापन
Chaubari fair has accumulated so lively - फोटो : बरेली, अमर उजाला
विज्ञापन
करेंसी चेंज ने चौबारी मेले की रौनक ही छीन ली है। है।  नोटों के अभाव ने मेले के बाजार का अर्थशास्त्र ही बिगाड़ दिया है। नखासा की आमदनी पिछले साल के मुकाबले पांच फीसदी ही रह गई है। मेला प्रबंधक जयवीर सिंह रसीदें दिखाते हुए बताते हैं कि पिछले साल नखासा में मेला के इन शुरुआती दिनों में एक लाख रुपये की महसूल (कमीशन) की वसूली हो जाती थी, जो पशुओं की बिक्री की महज चार फीसदी होती है लेकिन इस बार यह घटकर 20 हजार रुपये प्रतिदिन सीमित रह गई है।  दूसरे मेला प्रबंधक छोटे सिंह इस बार अगले पांच दिनों में कम से कम आठ से 10 लाख रुपये महसूल की धनराशि का घाटा होने का अनुमान लगा रहे हैं। उनका कहना है कि स्नान के दो दिन पहले और दो दिन बाद नखासे में पशुओं की अच्छी बिक्री हो जाती रही है लेकिन करेंसी चेंज से लोग पशुओं को खरीदने ही नहीं आ पा रहे हैं।
विज्ञापन

यह स्थिति तब है जब नखासा बाजार में पांच सौ और एक हजार के पुराने नोट लिए जा रहे हैं। किच्छा के राशिद ने शब्बीर के हाथ 10500 रुपये में अपना घोड़ा बेचने के बाद बताया कि पांच सौ और हजार के पुराने नोट न लें तो क्या करें। किसी के पास नए नोट हैं नहीं और सौ- पचास के छुट्टे नोटों की किल्लत है। हम बैंक से बदल लेंगे। शब्बीर ने कहा कि अगर पुराने नोट नहीं लिए जाएंगे तो नए नोट इतनी जल्दी कहां से ले आएं।   अमरजीत सिंह कहते हैं कि जिला प्रशासन को मेला में बैंकों के काउंटर लगाने चाहिए ताकि उन पर लोग पुराने नोट बदल सकें।

खाने के भी लाले
सबसे ज्यादा दिक्कत छोटे नोटों की किल्लत से है। नखासा में पांच सौ और एक हजार के पुराने नोट की स्वीकार्यता के बावजूद कोई भी उनके बदले सौ या पचास रुपये के नोट देने को तैयार नहीं है। होटल का ठेला लगाने वाले अखिलेश को यासीन पांच सौ रुपये का नोट देकर 100 रुपये का खाने के बदले चार सौ रुपये मांगते हैं तो वह मना कर देता है। एक तो पांच सौ रुपये न चलने का डर, दूसरा छुट्टे पैसे की समस्या। परिवार केे छह-सात लोगों के साथ फतेहपुर से घोड़े-घोड़ियां बेचने नखासा में आए यासीन बताते हैं कि हमारे पास सौ, पचास के नोट खत्म हो चुके हैं, अब पांच सौ और हजार के नोट कोई लेने को तैयार नहीं है इसलिए खाने के भी लाले हैं। जैसे-तैसे हाथ जोड़कर एक होटल वाले को मनाया और एक हजार, पांच सौ के नोट जमा करके कह दिया कि खुले पैसे वापस मत करो, खाना खाते रहेंगे। इस तरह पैसे पूरे हो जाएंगे।
विज्ञापन


पशुओं के खाने की दिक्कत
चोकर विक्रेता आजाद मोहम्मद का कहना है कि हम तो पांच सौ और हजार के नोट ले भी लें लेकिन शाहमतगंज में चोकर के थोक व्यापारी नहीं ले रहे तो क्या करें। फतेहपुर से घोड़े-घोड़ियां बेचने आए मोहम्मद हनीफ कहते हैं कि पशुओं को चोकर के लिए भी खुले पैसे नहीं हैं। समझ में नहीं आ रहा क्या करें? जैसे-तैसे मेला प्रबंधकों से बड़े नोटों के बदले खुले पैसे का इंतजाम करा लिया लेकिन अब तो उन्होंने भी हाथ खड़े कर दिए हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें