यह जानकर आप हैरान रह जाएंगे कि खाद्य पदार्थों के जरिये जाने-अनजाने हमारे शरीर में पहुंच रहे सिंथेटिक कलर स्लो प्वायजन नुकसान नहीं पहुंचा रहे हैं। तमाम और दुष्प्रभावों के अलावा ये कलर प्रजनन क्षमता तक समाप्त कर सकते हैं। बरेली कॉलेेज के जंतु विज्ञान विभाग में ‘बायो केमिकल एंड हिस्टोपैथोलॉजिकल एल्ट्रेशन इंडयूस्ड बाई एडल्ट्रैट्स इन एल्बीनो रैट्स’ टॉपिक पर हुए शोध में यह चौंकाने वाली सच्चाई सामने आई है। डॉक्टरों के मुताबिक अगर ये सिंथेटिक कलर लंबे समय तक शरीर में पहुंचते हैं तो कैंसर तक का कारण बन सकते हैं।
बाजारों में बिक रहे सिंथेटिक कलर्स से बने खाद्य पदार्थ हमारे शरीर में पहुंचकर लिपिड प्रोफाइल यानी खून के कई सारे अवयवों को प्रभावित कर रहे हैं। सिंथेटिक्स कलर कोलेस्ट्रॉल लेवल बढ़ाने के साथ हृदय संबंधी बीमारियों का कारण तो बन ही रहे हैं, पुरुषों में टेस्टीज (वीर्यकोष/ शुक्र ग्रंथि) और महिलाओं में ओबरी (अंडाशय) को भी सीधे प्रभावित कर रहे हैं। इससे पुरुषों में स्पर्म बनना कम हो सकता है जिससे उनकी प्रजनन क्षमता कम होने लगती है। विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. बीनम सक्सेना को यूजीसी से मिले मेजर रिसर्च प्रोजेक्ट के तहत तीन साल चले शोध में यह तथ्य सामने आए हैं। सिंथेटिक कलर सेे लिवर, किडनी और अन्य आर्गन तथा एंटी ऑक्सीडेंट एंजाइम का लेबल भी प्रभावित होता है।
सफेद चूहों पर किए गए रंगों के प्रयोग के आए खतरनाक नतीजे
डॉ. बीनम सक्सेना ने मेटेलिन यलो, सनसेट यलो और टाटराजिन का एल्बीनो रैट़्स (सफेद चूहे) के तीन अलग-अलग समूह बनाकर प्रयोग किया। एक समूह को कोई डोज नहीं दी, दूसरे को 25 मिलीलीटर, तीसरे को 50 और चौथे को 75 मिलीलीटर की डोज एक-एक माह के गैप पर दिया। इसके बाद विभिन्न पैरामीटर्स पर उनके खून में होने वाले बदलाव और शरीर के अंगों पर पड़ने वाले प्रभाव का मूल्यांकन किया। चौथे ग्रुप जिसको 75 मिलीलीटर डोज दी गई थी, उसका लिपिड प्रोफाइल चेक किया गया तो उसमें कोलेस्ट्रॉल की मात्रा 48.56 फीसदी अधिक मिली। वहीं ट्राइग्रिसाइड 98 फीसदी और हाई डेनसिटी लिपिओप्रोटीन यानि एलडीएल की मात्रा 38.28 फीसदी अधिक मिली। एलडीएल शरीर में वसा की मात्रा बताता है। वहीं लो डेंसिटी लिपिओप्रोटीन की मात्रा घटी है। प्रोटीन की मात्रा भी 36.65 फीसदी घटी जबकि ग्लूकोज की मात्रा में 59.62 फीसदी बढ़ी। ग्लूकोज का अधिक होना भी खतरनाक साबित हो सकता है। जिगर के ऊतकों पर भी इसका प्रभाव पड़ा। जिस ग्रुप को हाई डोज दिया गया उसके मेल वर्जन में वीर्यकोष और फीमेल में अंडाशय पर भी बीस से तीस फीसदी का प्रभाव पड़ा। मेल वर्जन की प्रजनन क्षमता काफी हद तक कम हो गई। उसके स्पर्म डैमेज हुए।
मिठाइयों, दालों और नमकीन में होता है प्रयोग
मेटेलिन यलो, सनसेट यलो और टाटराजिन रसायानिक क्रिया करने वाले रंग हैं। मेटेलिन यलो का अरहर की दाल, हल्दी, बेसन में सबसे ज्यादा प्रयोग होता है। सेनसेट यलो का कोल्डड्रिंक्स, मिठाई, आइसक्रीम और बेकरी प्रोडक्ट में प्रयोग किया जाता है। इसके अलावा जलेबी, जेली, बेसन के लड्डू, बूंदी के लड्डू, सोनपापड़ी, टॉफी आदि में भी इन रंगों का प्रयोग किया जाता है।
तेजी से बढ़ता है वजन
सिंथेटिक कलर्स से न केवल शरीर के ऑर्गेन बल्कि शरीर का वजन भी बढ़ने लगता है। टाटराजिन के सेवन से शरीर का वजन तेजी से बढ़ता है। शोध में जब तीनों ग्रुप के चूहों का वजन किया गया तो तीस से चालीस फीसदी का अंतर मिला। यानी इन सिंथेटिक कलर के सेवन से आप मोटापे का भी शिकार हो सकते हैं।