फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

बेंत कारोबार: कभी विदेशों तक थी मांग.. आज वजूद का संकट

विज्ञापन
बरेली में बड़े स्तर पर होता है बेंत का सामान बनाने का काम। - फोटो : अमर उजाला, बरेली
विज्ञापन
बरेली। बेंत के फ र्नीचर की कभी देश भर में मांग थी लेकिन फिलहाल यह कारोबार बरेली में वजूद के संकट से जूझ रहा है। अब यह कारोबार बमुश्किल एक हजार कारीगरों तक सिमट गया है। कारीगरों का कहना है कि नोटबंदी से इस उद्योग को तगड़ा झटका लगा जिससे किसी तरह उसने उबरने की कोशिश की लेकिन जीएसटी ने उसे धराशायी कर दिया। एक जनपद, एक उत्पाद योजना से भी इस कारोबार का कोई भला नहीं हुआ।
विज्ञापन

पुराना शहर के बेंत कारीगर आसिफ का कहना है कि वह कारोबार भी करते हैं और कारीगरी भी। पहले उनके पास पांच से छह कारीगर थे। अब एक ही कारीगर है और वह खुद फर्नीचर बनाते हैं। वह कहते हैं कि पहले सोफे, कुर्सी की बहुत डिमांड थी। अब डिमांड ही खत्म हो गई है। आर्डर पर ही वह फर्नीचर तैयार करते हैं। इस समय सिर्फ गमला स्टैंड, मैग्जीन स्टैंड और टेबल जैसा मामूली काम रह गया है। पिछले छह महीने से कारोबार लगभग पूरी तरह ठप पड़ा है। दुलारे मीर कहते हैं कि 2015 तक उनके पास बीस कारीगर थे, अब दो से ही काम चला रहे हैं। ज्यादातर कारीगर यह काम छोड़कर मजदूरी कर रहे हैं।
कारीगराें की मांग
बेंत कारोबार पर जीएसटी खत्म हो, कच्चे माल की उपलब्धता बढ़ाई जाए और सब्सिडी पर लोन दिया जाए। उनके लिए डिजायनिंग सेंटर खुले, 18 फीसदी टैक्स खत्म किया जाए।
विज्ञापन

जरी कारोबार: एक बार धागे खुले तो जुड़ ही नहीं पाए
बरेली। एक समय था जब बरेली के जरी उद्योग की दूर-दूर तक धाक थी। पंजाब, पाकिस्तान और बांग्लादेश में होने वाली शादियाें में बरेली की जरी की तूती बोलती थी। नोटबंदी और फिर जीएसटी की मार ने इस कारोबार को भी तबाह कर दिया। नेताओं और अफसरों ने तमाम सपने दिखाए जो पूरे नहीं हो पाए। छोटे व्यापारियों का काम बंद हो गया है और हजारों लोग बेरोजगार हो गए हैं। इस बार बजट से आस थी जो पूरी नहीं हुई।
पुराना शहर के जरी कारीगर राजा का कहना है कि पहले सिर्फ वही पंद्रह सौ से अधिक साड़ियां और सूट पंजाब में सप्लाई करते थे। बीते चार सालों से इस बाजार में मंदी आनी शुरु हुई जो आज तक बनी हुई है। कारोबार इससे उबर नहीं पा रहा है। पहले एक-एक कारीगर सालभर में 10 लाख से एक करोड़ तक का व्यापार कर लेता था। अब दस लाख का कारोबार करने वाला एक लाख तक नहीं पहुंच पा रहा है। उन्हें बजट से भी उम्मीदें थी लेकिन उन्हें इससे कुछ नहीं मिला। जावेद का कहना है कि पहले वह सूरत में व्यापारियों को माल सप्लाई करते थे। उनके पास आर्डर लगे रहते थे, अब स्थितियां अलग हैं। सिर्फ सहालग में कारोबार कुछ रफ्तार पकड़ता है और फिर पूरी तरह से ठंडा पड़ जाता है। बताया कि वह सूरत में एक व्यापारी को दीवाली से पहले माल देकर आए थे जिसका पैसा अभी तक नहीं मिला है, कह रहे हैं कि माल बिका ही नहीं है। पहले यह स्थितियां कभी नहीं रहीं।
हजारों महिलाओं के हाथ खाली
घराें में जरी का ज्यादातर काम महिलाएं भी करती हैं। कई घरों में आदमी काम नहीं करते, घर महिलाएं और बच्चों के जरी की मेहनत से चलता था, अब दो समय की रोटी जोड़ना मुश्किल है। शहर के कुछ मोहल्लों में पूरा का पूरा परिवार इस कारोबार से जुड़ा है। महिलाएं घर के काम के साथ साथ जरी के काम को करती थीं। जरी का काम उनके आय का जरिया था, लेकिन अब महिलाएं बेरोजगार होती जा रही हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें