फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Bareilly News: ईंट भट्ठों में झुलस रहे नियम, पर्यावरण और किसानों को नुकसान

Mon, 02 Mar 2026 02:37 AM IST
बरेली ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, बरेली
विज्ञापन
विज्ञापन
शीशगढ़। थाना क्षेत्र में संचालित 24 ईंट भट्ठों में नियम झुलस रहे हैं। इन भट्ठों में राष्ट्रीय हरित अधिकरण के मानक और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के जिग-जैग तकनीक के अनिवार्य नियम को दरकिनार करके मुनाफे के लिए टायर की जली रबड़ या अन्य प्रकार के कार्बन ब्लैक का अवैध प्रयोग किया जा रहा है। यह न केवल हवा में जहर घोल रहा है, बल्कि अन्नदाताओं की भी रीढ़ कमजोर कर रहा है।
विज्ञापन

- - -
आंकड़े - उत्पादन में 50 फीसदी की गिरावट
टॉकिंग हेड - गांव बुंची के लालता प्रसाद ने कहा, भट्टों में कार्बन का इस्तेमाल होने से फसल का उत्पादन आधा हो गया है। पहले गेहूं ,धान की फसल तीन क्विंटल प्रति बीघा होती थी, अब डेढ़ क्विंटल प्रति बीघा होती है। भट्ठों के पास खेतों में फसल की कटाई के लिए मजदूर भी जल्द नहीं मिलते हैं। यहां उनको सांस की समस्या हो जाती है।
बागवानी की बदहाली -
टॉकिंग हेड - आमीन खान ने बताया कि काले धुएं से हवा में एथिलीन और सल्फर डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ती है। इस कारण सही से प्रकाश संश्लेषण न होने से आम के बौर जल जाते हैं। आसपास के गांव में रहने वाले बुजुर्गों को सांस लेने में भी तकलीफ होती है।
विज्ञापन


-
मजदूरों की सुरक्षा ताक पर
सहोड़ा के पास स्थित ईंट भट्ठे में मजदूर से पूछा तो उन्होंने कहा, वह बिहार के निवासी हैं। मालिक ने उन्हें 80% कोयले में कार्बन मिलाने को कहा है। यह कोयले से काफी सस्ता होता है। ऐसे ही सुल्तानपुर भट्टे पर मजदूरों ने बताया कि 60% कार्बन जलाया जाता है। किसी ईंट भट्ठे में मजदूर सुरक्षा उपकरण पहने नहीं दिखे।

वर्जन,
यदि कार्बन का प्रयोग हो रहा है तो जांच की जाएगी। सीजन से पहले निरीक्षण हुआ था। सीजन के बाद किसी भी भट्टे का निरीक्षण अभी नहीं किया गया है। - सुनील गंगवार, सहायक वैज्ञानिक, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड बरेली

ग्रामीणों ने शिकायत की है। प्रदूषण विभाग को जांच करके कार्रवाई का निर्देश दिया है। - आलोक कुमार, एसडीएम, मीरगंज
-
विशेषज्ञ
ईंट भट्ठों से निकलने वाले धुएं में सल्फर डाइऑक्साइड होता है। इससे आम के फल प्रभावित होते हैं। उनमें पल्प नेक्रोसिस बीमारी हो जाती है। इससे फल सड़ने लगते हैं इसलिए कोई भी भट्ठा बाग से 100 मीटर दूर होना चाहिए। चिम्नी भी ऊंची होनी चाहिए, जिससे धुआं ऊपरी वायुमंडल में विसरित हो सके। जमीन के स्तर पर प्रदूषण न फैलाए। इस धुएं से लीची, आणु भी प्रभावित होते हैं। अगर भट्ठे से राख ज्यादा निकलती है तो गेहूं-धान की फसल भी प्रभावित होती है। - डॉ. रंजीत सिंह, वरिष्ठ वैज्ञानिक, आईवीआरआई बरेली

-
जिग-जैग पद्धति
जिग-जैग पद्धति ईंट पकाने की आधुनिक तकनीक है। इसमें ईंटों की चिनाई इस प्रकार की जाती है कि गर्म हवा का प्रवाह सीधा न होकर टेढ़ा-मेढ़ा होता है। इससे काला धुआं सीधे हवा में नहीं जाता। गर्म हवा ईंटों के संपर्क में अधिक समय तक रहती है, जिससे ईंटें कम ईंधन में बेहतर और समान रूप से पकती हैं। यह राष्ट्रीय हरित अधिकरण के मानक में शामिल है।


-
नियमावली
उत्तर प्रदेश ईंट भट्ठा (स्थापना हेतु स्थल मापदंड) (प्रथम संशोधन) नियमावली-2026 को हाल में मंजूरी दी गई है। इसके अनुसार, राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के दूरी के नियम, रिहायशी या खेत-बाग से ईंट भट्ठे की दूरी 800 मीटर से एक किमी तय की गई। सभी भट्ठों के लिए जिग-जैग तकनीक और भट्ठा परिसर के चारों ओर 10 मीटर चौड़े इलाके में पौधरोपण करना अनिवार्य किया।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें