बरेली। खूब, बहुत खूब, बेमिसाल, जितनी भी तारीफ की जाए कम है। संगीत को मंच पर नाटक के रूप में पेश करना किसी करिश्मे से कम नहीं। यह थियेटर की तपस्या का ही परिणाम हो सकता है। निर्देशक सुनील शानबाग की तपस्या और जादूगरी का कमाल यहां थियेटर फेस्ट के दौरान विंडरमेयर में नाटक इस्टोरीज इन ए सांग में देखने को मिला। उन्होंने साबित कर दिया कि थियेटर के जरिए संगीत की कहानियां कही जा सकती हैं।
नाटक की इस प्रस्तुति में साफ कर दिया गया कि हर संगीत का अपना रूप है। उनके पीछे एक कहानी होती है। इसी कहानी को राज धराने से हजरत निजाम उद्दीन औलिया और हजरत अमीर खुसरों तक के सफर को तय करता यह नाटक अंग्रेजों के जमाने तक आता है। अंत में यह भी बता दिया गया कि शास्त्रीय संगीत के घराने तो होते हैं ठुमरी के अखाड़े भी होते हैं।
शास्त्रीय शैली में मंचित किया गए इस नाटक में कजरी, ठुमरी, दादरा, ख्याल रिमिक्स तक का सफर अलग-अलग कहानियों के माध्यम से तय होता है। मसलन अंग्रेजो के जमाने में जब तवायफों का विरोध शुरु हुआ तो समाज सेवी कोठे बंद कराने के लिए वाइस राय के पास गए। जब वहां बात नहीं बनी तो लोग महात्मा गांधी के पास गए। उन्होंने सब को बनारस में बुला कर उनकी कला पर रोक तो नहीं लगाई अलबत्ता देश की आजादी में जोड़ने के लिए उनसे देश भक्ति गीत गवाय।
इसी तरह इस्ट इंडिया कंपनी जब भारत में थी। तो उन्होंने भारतीय संगीत को सीखना चाहा। मगर वह ले नहीं जा पाए। अलबत्ता अपना संगीत जरूर छोड़ गए जो आज हमारे संगीत को तोड़ने मरोड़ने में लगा है। कुछ ऐसी संगीत से जुड़ी एतिहासिक घटना को जोड़ते कुल सात कहानियों को इस नाटक में पेश किया गया। जो संगीत के गुलदस्ते से कम नहीं थी।
इस नाटक की कहानी का कंसेप्शन शुभा मुद्गल और अनीश प्रधान का है। इस नाटक का एक एक कलाकार अभियन से लेकर गायकी तक मुकम्मल था। महिला पात्र हो या पुरुष कोई किसी से कम नहीं था। अलबत्ता नमित दास, गोपाल तिवारी और गुरु की भूमिका निभाने वाले खास रहे।
दया दृष्टि रंगविनायक ओर से आयोजित थियेटर फेस्ट के चौथे रोज संगीतकार आलोक बनर्जी ने निर्देशक सुनील शानबाग को बुके देकर सम्मानित किया। चेयरमैन डा. ब्रिजेश्व सिंह ने आभार व्यक्त किया। सीईओ शिखा सिंह ने बताया कि सोमवार को बाड़ा (दी स्लाटर हाउस) का मंचन शाम 6.30 बजे किया जाएगा।