गांव-देहात में मरीजों की सेहत से खिलवाड़ किया जा रहा है। खून की कमी वाले मरीजों को वह दवा बांटी जा रही है जिसका बीमारी से कोई मतलब ही नहीं। यह खुलासा सीएचसी और पीएचसी से दी जानी वाली हीमोग्लोबिन बढ़ाने की सीरप की जांच में हुआ है जो रद्दी निकली। इसे छह महीने पहले स्वास्थ्य केंद्रों को भेजा गया था। अब सीरप की सप्लाई और वितरण पर रोक लगा दी गई है। दवा बनाने वाली इंदौर की कंपनी को नोटिस जारी कर लाइसेंस निरस्तीकरण की संस्तुति की गई है। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र को केंद्रीय औषधि वितरण इकाई (सीएमएसडी) दवा सप्लाई करती है। छह महीने पहले यहां से सप्लाई होने वाली हीमोग्लोबिन बढ़ाने की दवा ‘फेरा सलफेट एंड फोलिक एसिड’ की शिकायत मिलने के बाद फरवरी में खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन की ओर से इस दवा के तीन बैच के नमूने लिए गए। मई में इसकी रिपोर्ट आई, जिसमें तीनों बैच के नमूने फेल हुए हैं। यह अधोमानक पाए गए हैं। ड्रग इंस्पेक्टर के मुताबिक दवा में कंटेंट सही तरह से मिश्रित नहीं थे।
फेरा सल्फेट फोलिक एसिड दवा इंदौर की क्विस्ट लैबोरेटरी बनाती है। औषधि प्रशासन की ओर से कंपनी को नोटिस जारी कर साक्ष्य मांगे गए है। साथ ही लाइसेंस निरस्तीकरण के लिए मुख्यालय को संस्तुति भेजी गई है। अगर दवा में कंटेंट कम होगा तो मुकदमा भी दर्ज हो सकता है।
सीएमओ की शिकायत पर जांच
सीएमओ को दवा के संबंध में शिकायत मिली तो उन्हाेंने इसकी जांच के लिए खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन को पत्र लिखा। इसके बाद नमूने लिए गए। यह दवा काफी समय से बांटी जा रही थी। जांच के बाद इसके वितरण पर रोक लगा दी गई है।
जांच में नमूना फेल हो गया है। दवा के वितरण पर रोक लगा दी गई है। लाइसेंस निरस्तीकरण की संस्तुति के लिए मुख्यालय को लिखा जाएगा।
-नवनीत यादव, ड्रग इंस्पेक्टर, खाद्य एवं औषधि प्रशासन