छह दशक पहले बरेली के पंडित धर्मदत्त वैद्य के परिवार की राजनीति में प्रदेश तक धमक थी। पं. धर्मदत्त वैद्य कांग्रेस की प्रदेश सरकार में 18 साल मंत्री और 32 साल विधायक रहे। उनकी राजनीति की शुरुआत प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री पं. गोविंद बल्लभ पंत के चुनाव एजेंट के रूप में हुई थी। वह अंग्रेजी शासन में चार साल जेल में भी रहे। उनके बेटे भूपेंद्र नाथ शर्मा ने 1977 में मीरगंज से विधानसभा चुनाव लड़ा। उसमें पार्टी फंड से उनको 15 हजार रुपये चुनाव प्रचार के लिए मिले थे। पूरे चुनाव में 11.5 हजार रुपये ही खर्च हुए और वह चुनाव जीतकर विधायक बन गए। बाकी बचे साढ़े तीन हजार रुपये जब वह पार्टी दफ्तर में वापस करने गए तो बड़े नेताओं ने उनकी ईमानदारी पर पीठ ठोकी थी।
भूपेंद्रनाथ शर्मा इसके बाद 1989 में भी मीरगंज से चुनाव लड़कर विधायक बने। तब उनको सपा का समर्थन था। लेकिन इसके बाद राजनीति में पैसे के बढ़ते प्रभाव और गिरते स्तर से दुखी होकर उन्होंने संन्यास ले लिया। हालांकि अब 85 साल की उम्र में भी वह घर रहकर राजनीति पर गहरी नजर रखते हैं। अपने जमाने और आज की राजनीति में अंतर बताते हुए उनका कहना है कि तब राजनीति में ईमानदारी और कैडर की सबसे ज्यादा पूछ थी लेकिन अब उसकी जगह पैसे ने ले ली है। राजनीति व्यापार बनकर रह गई है। लोग चुनाव से पहले राजनीति में बेशुमार पैसा लगाते हैं। चुनाव जीतकर अनाप-शनाप तरीके से कमाने के तरीके ढूंढते हैं। पूर्व विधायक के मुताबिक लोकतंत्र में राजनीति की मर्यादा कैडर और ईमानदारी में ही है, न कि पैसे में। भूपेंद्रनाथ शर्मा के दो बेटे भी राजनीति से दूर रहकर चिकित्सा और शिक्षा व्यवसाय से जुड़े हैं।