विवश होकर 17 साल बाद लिया था मुआवजा
रामपाल ने बताया कि उनके तीनों भाइयों की जमीन दिसंबर 2005 में बीडीए ने कब्जे में ले ली थी। वह 165.51 रुपये प्रति वर्गमीटर की दर से मुआवजा दे रहा था, जबकि उनकी जमीन 2016 में अवार्ड हुई थी। वह मुआवजा राशि लेने के लिए तैयार हुए तो बीडीए ब्याज देने के लिए राजी नहीं हुआ। इस पर रामपाल व कालीचरन ने मार्च 2016 में हाईकोर्ट में बीडीए के विरुद्ध वाद दाखिल कर मुआवजे की रकम पर ब्याज की मांग की थी।
दो जनवरी 2024 को हाईकोर्ट ने उनके पक्ष में फैसला सुना दिया था, जिसे बीडीए और एसएलएओ मानने के लिए तैयार नहीं थे। इस कारण उन्होंने एसएलएओ के विरुद्ध अवमानना वाद दाखिल किया था। तीनों भाइयों ने बीडीए से 17 साल तक मुआवजा स्वीकार नहीं किया। भूमिहीन होने से गरीबी झेलना मुश्किल हो रहा था तो वह बीडीए की शर्तों को स्वीकारने के लिए विवश हुए और 19 फरवरी 2022 को 96.71 लाख रुपये बतौर मुआवजा ले लिया था।
आठ किसानों के 290 करोड़ बाकी
रामगंगानगर आवासीय योजना के लिए जमीन देने वाले 150 से अधिक किसान 19 साल बाद भी मुआवजा पाने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं। लारा कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक के आदेश हो चुके हैं, जिसे बीडीए मान नहीं रहा है। जानकारी के मुताबिक, आठ किसानों का बीडीए पर कुल 290 करोड़ ब्याज समेत मुआवजा बाकी है। इसमें देवेंद्र प्रताप व महेंद्र के मूलधन के 26.50 करोड़ और ब्याज समेत कुल 101.56 करोड़ रुपये बाकी हैं।
ओम प्रकाश, रामप्रकाश व गुलशन देवी के ब्याज समेत कुल 12.57 करोड़ रुपये मुआवजा बाकी है। पार्वती आदि के 12.11 करोड़, जाकिरा खान के 51.33 करोड़ और फैज उल्ला खान के 113 करोड़ रुपये बीडीए पर बाकी हैं। इन लोगों ने लारा कोर्ट में वाद दाखिल कर यह राशि दिलाने की मांग की है।