बरेली। अंग्रेजी शासन के खिलाफ वर्ष 1857 में स्वाधीनता संग्राम का बिगुल भले ही मेरठ से बजा, पर इसमें रुहेलखंड के क्रांतिवीरों ने बाजी मारी। रुहेलखंड के दूसरे नवाब हाफिज रहमत खान के पौत्र नवाब खान बहादुर खान की अगुवाई में यह लड़ाई लड़ी गई थी। एक ही दिन में अंग्रेजों के दांत खट्टे कर उन्होंने रुहेलखंड को अंग्रेजों के चंगुल से आजाद करा लिया था। वह ऐतिहासिक दिन 31 मई ही था।
मेरठ क्रांति की ज्वाला 30 मई की रात बरेली पहुंची। गोपनीय पत्र के जरिये नवाब खान बहादुर खान, मुंशी शोभाराम व सरदार बख्त खां को बरेली में क्रांति की जिम्मेदारी दी गई थी। इन क्रांतिकारियों ने 31 मई को तड़के ही अंग्रेज अधिकारी कैप्टन ब्राउनली के बंगले को फूंक दिया। इसके बाद अंग्रेजों को संभलने का मौका दिए बिना ही उनको मारते रहे। कुछ अंग्रेज व्यापारियों ने विरोध किया तो उन्हें भी क्रांतिकारियों ने मार दिया। कई अंग्रेज अधिकारी जान बचाने के लिए नैनीताल भाग गए। शाम तक शहर पर आजादी का झंडा फहरा दिया गया।
अगले दिन यानी पहली जून को शहर में जीत का जुलूस निकाला गया। कोतवाली पर बने चबूतरे पर खान बहादुर खान की ताजपोशी करते हुए उनको रुहेलखंड का नवाब घोषित कर दिया गया। शोभाराम को दीवान व बख्त खां को सेनापति की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। हालांकि, उनका शासन मात्र दस माह ही रह पाया था। इसके बाद अंग्रेजों ने दोबारा शहर पर कब्जा कर लिया।
नवाब खान बहादुर नेपाल चले गए, लेकिन वहां के लोगों ने अंग्रेजों को सूचना देकर उन्हें गिरफ्तार करा दिया। 24 मार्च 1860 को कोतवाली में हथकड़ी और बेड़ी के साथ उनको फांसी दे दी गई। उसी हाल में उन्हें कचहरी स्थित जिला जेल में सुपुर्द-ए-खाक किया गया। उनकी बेड़ियों का कुंडा आज भी मजार शरीफ के ऊपर निकला हुआ है। संवाद
बदहाल है मकबरा
नवाब खान बहादुर खान की मजार जिला जेल से 147 साल बाद आजाद तो हुई, मगर उनका मकबरा बदहाल है। टिन शेड में सुराख हो चुके हैं। फुलवारी सूख गई है। फर्श भी उखड़ चुका है। उनके वंशजों को भी इस बात का मलाल है। उनकी आठवीं पीढ़ी के वंशज नवाब लियाकत खां चाहते हैं कि इसका सौंदर्यीकरण कराया जाए।