इंतजार: रिंग रोड का सपना 34 साल बाद भी पूरा नहीं हुआ
रिंग रोड का सपना 34 साल बाद भी पूरा नहीं हुआ। वर्ष 1993 में रिंग रोड की परिकल्पना हुई। टेंडर प्रक्रिया और बजट आवंटन के बाद काम आगे बढ़ा, लेकिन आधा ही हुआ। अब आधे काम को पूरा कराने के लिए एनएचएआई ने 1,700 करोड़ रुपये की परियोजना बनाई है। निर्माण के लिए वित्तीय स्वीकृति का इंतजार है, पर सिर्फ भूमि का मुआवजा देने के लिए 800 करोड़ की मंजूरी मिल सकी है।
1700 करोड़ रुपये की परियोजना बनाई
800 करोड़ की मंजूरी मिल सकी
कसक : बजट नहीं मिलने से भवन अधूरा
शैक्षिक विकास से जुड़ी एक महत्वपूर्ण परियोजना अधूरी रही। राजकीय पॉलिटेक्निक के अधूरे भवन को पूरा करने के लिए शासन स्तर से बजट आवंटित नहीं हुआ। पूरे साल पत्राचार होता रहा। इसे पूरा करने के लिए करीब 6.78 करोड रुपये की जरूरत है। राजकीय पॉलिटेक्निक के प्रधानाचार्य नरेंद्र कुमार का कहना है कि किसी भी समय पर बजट जारी हो सकता है।
देरी से ही सही शुरू हुआ विकास
बहुप्रतीक्षित ग्रेटर बरेली आवासीय परियोजना भी आकार ले रही है। इसके सेक्टर-एक से चार तक बीडीए ने सड़क, पानी की लाइन, सीवर लाइन बिछाने का काम शुरू करा दिया है। वर्ष 2025 में यहां आवंटियों को भूखंडों पर कब्जा दिए जाने की योजना है।
सितारगंज हाईवे : घोटाले से सुस्त हुई रफ्तार
बरेली-सितारगंज हाईवे पर भू अधिग्रहण घोटाले की आंच आई। तीन माह तक परियोजना जांच में फंसी रही। इस दौरान काम ठप रहा। जांच पूरी होने के बाद काम को रफ्तार दी गई। इसका निर्माण 2026 तक पूरा होगा। बरेली-बदायूं हाईवे के चाैड़ीकरण की वित्तीय बिड भी खुल चुकी है।
एक ट्रांसमिशन और तीन बिजली उपकेंद्र मिले, पर व्यवस्था में नहीं आया सुधार
शहर की बिजली व्यवस्था में सुधार के लिए भी कई काम हुए, अपेक्षित सुधार नहीं हुआ। साउथ सिटी में 220 केवी ट्रांसमिशन उपकेंद्र का काम पूरा होने के बाद भी सुभाषनगर, मढ़ीनाथ और किला उपकेंद्रों की वहां से आपूर्ति शुरू नहीं हो सकी। सुभाषनगर में बिजली उपकेंद्र की स्थापना के लिए पूरे साल जमीन ही नहीं मिल सकी। हालांकि, पवन विहार में उपकेंद्र का निर्माण शुरू हो गया है। शहर के ज्यादातर इलाकों में लाइनें बदलने का काम भी इस साल पूरा हो गया। अगले साल गर्मियों में सुधार की उम्मीद है।
न अतिक्रमण से मुक्ति और न मिल सका जाम से छुटकारा
जाम से निपटने और शहर की यातायात व्यवस्था में सुधार के लिए ई-रिक्शा, ऑटो के निर्धारित रूटों पर कलर कोडिंग से संचालन की कवायद आगे ही नहीं बढ़ सकी। इस दौरान शहर की सड़कों पर वाहनों का दबाव लगातार बढ़ता रहा। ट्रैफिक पुलिस जाम से निजात के लिए तरह-तरह के प्रयोग करती रही, पर कामयाबी नहीं मिली।
सड़कों का चौड़ीकरण नहीं करा पाए अधिकारी
एक साल से बजट होने के बावजूद तपेश्वरनाथ मंदिर की ओर जाने वाले मार्ग का चौड़ीकरण नहीं हो सका। पीडब्ल्यूडी ने रेलवे से अनापत्ति प्रमाणपत्र मांगा था, लेकिन मामला अटक गया। सेटेलाइट से बड़ा बाइपास तक का मार्ग सिक्स लेन नहीं हो सका। कभी मंडलायुक्त ने पहल की तो कभी विधायक ने पैरवी की, प्रस्ताव बनते रहे, लेकिन निर्माण के लिए 301 करोड़ रुपये नहीं मिले।
पुलों से मिली शहर को रफ्तार
- फोटो : अमर उजाला
आकार ले रही रामायण वाटिका
रामगंगानगर में 32.5 करोड़ रुपये की लागत से रामायण वाटिका आकार लेने लगी है। इसके निर्माण में तेजी आई है। गांधी उद्यान के बाद यह शहर के लिए दूसरा सबसे बड़ा सार्वजनिक पार्क होगा। यहां 9.30 करोड़ रुपये की लागत से वनवासी राम की 51 फुट ऊंची कांस्य प्रतिमा मूर्तिकार राम सुतार तैयार कर रहे हैं। हनुमानजी की मूर्ति लग चुकी है। साल के अंत में प्राधिकरण ने यहां पुष्प प्रदर्शनी भी आयोजित करने की तैयारी की है।