बरेली। बरेली कॉलेज के इतिहास में पहली बार किसी महिला शिक्षक के प्राचार्य बनने का नंबर आया है लेकिन इससे पहले ही उनका हक मारने की तैयारी कर दी गई है। कॉलेज के शिक्षकों के बीच यह बात चर्चा का विषय बनी हुई है। कहा जा रहा है कि अगर ऐसा हुआ तो बरेली कॉलेज में महिला अधिकारों की बात करना भी बेमानी हो जाएगी।
पुरुष प्रधान भारतीय समाज की धारणा को बदलने के लिए सरकार लगातार प्रयास कर रही है। समाज में उन्हें बराबरी का दर्जा दिलाने के लिए राजनीति से लेकर हर क्षेत्र में उनकी जगह सुनिश्चित करने के प्रयास चल रहे हैं। मगर बरेली कॉलेज प्रबंधन अब भी संकीर्ण मानसिकता से बाहर आने को तैयार नहीं है। वर्ष 1837 में स्थापित बरेली कॉलेज में यह पहला मौका है, जब किसी महिला शिक्षक के प्राचार्य बनकर प्रतिनिधित्व करने की बारी आई है। मगर महिलाओं के हक और बराबरी का दर्जा देने का दम भरने वाले समाज के ठेकेदार उनसे यह हक छीनने की तैयारी कर चुके हैं। महिला शिक्षकों की वरिष्ठता को दरकिनार कर उनका हक उनसे जूनियर शिक्षक को देने की तैयारियां बरेली कॉलेज में चर्चा का विषय बन गई हैं। शिक्षकों का कहना है कि कॉलेज और शिक्षकों की जिम्मेदारी बेहतर समाज के निर्माण के लिए युवाओं को दिशा दिखाने की है। मगर जब कॉलेज में ही राजनीति के चलते इस तरह के घटनाक्रम होने लगेंगे तो समाज को दिशा कौन दिखाएगा। उनका कहना है कि अगर ऐसा हुआ तो बरेली कॉलेज में महिला अधिकारों की बात करना भी बेमानी कही जाएगी। बता दें कि इससे पहले बरेली कॉलेज में डॉ. वंदना शर्मा को पहली महिला चीफ प्रॉक्टर के रूप में जिम्मेदारी दी गई है और अब प्राचार्य पद पर महिला शिक्षक के प्रतिनिधित्व की बारी आई है।