पीएनबी में बड़े घोटाले के बाद बैंकों की स्थिति को लेकर हर कोई चिंतित है। ग्राहक और कर्मचारी दोनों। जहां ग्राहकों में थोड़ी असुरक्षा की भावना है वहीं बैंक के कर्मचारी भी चिंतित हैं। उन्हें बैंक के एनपीए (नान परफार्मिंग एसेस्ट्स) को लेकर चिंता है। उनकी चिंता जायज भी है। बैंकों का एनपीए जो बताया जा रहा है, उसके सापेक्ष यह दोगुना हो सकता है।
बैंकों द्वारा दिए गए ऋण की रिकवरी न होने से उनका एनपीए बढ़ता जा रहा है। मगर बैंक इसे छिपा रहे हैं। सूत्रों का कहना है कि यह आंकड़ा घोषित तौर पर 6-7 फीसदी है, मगर यह दोगुने से भी ज्यादा हो सकता है। माना जा रहा है यह 15-20 फीसदी तक हो सकता है। जबकि बैंकों की तरफ से निर्धारित मानक एनपीए 3-4 फीसदी ही होता है। बढ़ रहे एनपीए के पीछे कारण है कि बड़े किसानों और घरानों को दिया गए ऋण की वसूली नहीं हो पाना। एनपीए छिपाने का सबसे बड़ा खेल केसीसी किसानों के साथ होता है। किसानों द्वारा लिया गया लोन पलटी करके नए लोन के रूप में बढ़ाकर दे दिया जाता है। काश्तकार को जानकारी न होने के कारण उन्हें नए लोन के रूप में बढ़ा हुआ पैसा दे दिया जाता है। इससे उस खाते पर एनपीए उस वर्ष के लिए शून्य हो जाता है। जबकि बड़े किसान और घराने लोन वापस ही नहीं करते हैं। यही सबसे बड़ा कारण है एनपीए बढ़ने का। सूत्रों का यह भी कहना है कि एनपीए कम दिखाने और कम करने का दबाव ऊपर से ही होता है। एनपीए के आंकड़े उनके अपने-अपने होते हैं। लीड बैंक की कोई भूमिका नहीं होती है।
जिले में 700 करोड़ से अधिक एनपीए
विभिन्न बैंकों की मिलीभगत से बड़े बकायेदार नियमित किस्त जमा नहीं करते हैं, उन्हें ऊपर के इशारे पर पूरी छूट मिली हुई है। बैंक प्रबंधन उन्हें डिफाल्टर सूची में न लाने के लिए भरसक प्रयास रत रहता है। कहीं बीच में कुछ पेमेंट दिखा दिया जाता है। जबकि मानकों के विपरीत खातों में यह भुगतान होता है। यही वजह है कि जिले में एनपीए सात सौ करोड़ से ऊपर पहुंच गया है। बैंक अपनी गोपनीयता के नाम पर इसे छिपाए बैठे हैं। साथ ही लीड बैंक को भी यह आंकड़े उपलब्ध नहीं कराए जाते हैं। नियमानुसार सभी शाखाओं और क्षेत्रीय कार्यालयों पर डिफाल्टर अथवा नियमित भुगतान न करने वाले बड़े बकायादारों की सूची प्रदर्शित होनी चाहिए। देश का सबसे बड़ा पीएनबी घोटाला सामने आने पर भी बैंकों की चालढाल आज भी मदमस्त है।