हर मुसलमान मर्द और औरत जो बालिग हो उस पर रमजान के रोजे फर्ज हैं। नाबालिग बच्चे और पागल पर रोजे फर्ज नहीं हैं। इसके अलावा और भी कई सूरत हैं जिसमें कुछ और लोगों को भी रोजा न रखने की इजाजत दी गई है। इसमें जो शख्स शरअन मुसाफिर है। उसको कुरान व हदीस में रमजान के रोजे न रखने की इजाजत दी गई है लेकिन सफर में अगर आराम हो कोई खास परेशानी न हो तो रोजा रख लेना ही बेहतर है। हां अगर न रखे तब भी वह गुनाहगार नहीं है जब कि रमजान के बाद कजा कर ले।
जो शख्स बुढ़ापे की वजह से इतना कमजोर हो गया कि उसमें रोजा रखने की ताकत नहीं और आइंदा सही होने की भी कोई उम्मीद नहीं उस पर रोजे माफ हैं। रोजे के बदले फिदया देना उस पर वाजिब है। फिदया यह है कि हर रोजे के बदले एक मोहताज को दोनों वक्त पेट भर खाना खिलाएं या हर रोजे के बदले सकदा-ए-फितर के बराबर गल्ला या रुपया खैरात करे। जो ज्यादा सही तहकीक के मुताबिक तकरीबन 2 किलो 45 ग्राम गेहूं है।
किसको दें फिदया
बरेली। आज कल सही मायने में जरूरतमंद मोहताज व मिसकीन नहीं मिलते। आम तौर पर पेशेवर फकीर हैं। उनमें भी ज्यादातर वे नमाजी, फासिक व बदकार, गुंडे, लफंगे, जुआरी और शराबी तक हैं। लेहाजा दीनी मदरसों के तलबा और जरूरतमंद मुस्तहक मस्जिदों के इमामों व मोअज्जिनों को इस किस्म की रकमें या गल्ले दे दिए जाएं तो ज्यादा बेहतर है।
इसके अलावा वह औरतें जिनके शौहर इंतकाल कर गए और उन्होंने दूसरा निकाह भी न किया, ऐसे ही वह घर जिनमें एक ही कमाने वाला था, वह भी बीमार हो गया। इस किस्म के लोग अगर साहिबे जायदाद न हों सदकात व खैरात जकात के मुस्तहक हों। ऐसों को तलाश करके देना चाहिए। पेशेवर और मांगने वालों से ऐसे जरूरतमंदों को देना ज्यादा सवाब का काम है।