बरेली। रुहेलखंड विश्वविद्यालय में इन दिनों पीएचडी की आरडीसी सिनोप्सिस का वायवा लिया जा रहा है। इस बीच छात्रों का आरोप है कि चुनिंदा छात्रों की सहायता के लिए उनके सुुपरवाइजर सिनोप्सिस की कमी पाते हुए मदद करने लग जाते हैं।
पीएचडी में एक शोधार्थी को प्रवेेश व कोर्सवर्क पूरा होने के न्यूनतम छह माह से एक साल बाद आरडीसी (रिसर्च डिग्री कमिटी) वायवा के लिए बुलाया जाता है। इन दिनों कुछ सुपरवाइजर वायवा के लिए विषय विशेषज्ञों के समक्ष अपने छात्रों की मदद करते हैं, जबकि सामान्य छात्रों की आरडीसी को अस्वीकृत करने की श्रेणी में डाल देते हैं। ऐसे में विश्वविद्यालय में चर्चा ये भी है कि जाति विशेष के छात्रों को फेवर करते हुए उसका सुपरवाइजर अपने पसंदीदा छात्र की सहायता करते हैं। ऐसे में अगला छात्र आरडीसी में पास होने की उम्मीद छोड़ रहे हैं। छात्रों का कहना है कि कुछ छात्रों को माइनर चेंज के नाम पर सहायता दी जाती है, जबकि कुछ को भारी कमी बताते हुए दोबारा आरडीसी कराने के लिए कह दिया जाता है, जो पूरी तरह अनुचित है। यदि सहायता दी जाए तो एक समान, अन्यथा सभी से दोबारा आने के लिए कहा जाए। इस पर रुविवि के शोध निदेशालय के निदेशक डॉ. आलोक श्रीवास्तव का कहना है कि छात्रों का आरोप सुपरवाइजर या विषय विशेषज्ञों पर सही नहीं है, क्योंकि ये आपत्ति छात्रों के हित के लिए ही होती है, यदि छोटा बदलाव है तो उसे तुरंंत सही करने के लिए कहा जाता है। वहीं यदि बड़ा बदलाव है तो छात्र को अगली बार आरडीसी में शामिल होने के लिए कहा जाता है। वहीं, अब तक किसी भी छात्र की आरडीसी का परिणाम नहीं आया है। किस छात्र को क्या बदलाव करना होगा उसे एक माह बाद पता चलता है।