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आला हजरत ने दी थी शरई बैंकिंग की सलाह

Tue, 29 Nov 2016 01:09 AM IST
महबूब आलम/अमर उजाला, बरेली
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नोटबंदी, बैंक, करेंसी एक्सचेंज - फोटो : self
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सूद लेना- देना इस्लाम में हराम करार दिया गया है। इसलिए बैंकों में भी जमा धन पर कई मुस्लिम या तो ब्याज नहीं लेते या उसे अपने ऊपर खर्च नहीं करते हैं। बहुत सारे लोग ऐसे भी हैं जो शरियत पर अमल करते हुए बैंकों में पैसा  रखते ही नहीं  हैं। आला हजरत ने 97 साल पहले ही इसी संकट को देखते हुए शरई बैंकिंग को जायज ठहराया था। अब आरबीआई गर्वनर ने बैंकों में शरई विंडो खोलने के लिए भारत सरकार को प्रस्ताव भेजा है तो मुस्लिम समाज में हर्ष है। सुन्नी बरेलवी उलमा का मानना है कि यह अच्छा फैसला होगा।
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आला हजरत ने 1919 में मुसलमानों की भलाई के लिए 10 सूत्री कार्यक्रम लिखा था। इसमें उन्होंने इस्लामी बैंकिंग पर काफी जोर दिया। किताब फतावा रजविया (जिल्द 10) में इसका जिक्र है। 1970 में सरकारी बैंकों से पैसों के लेनदेन पर उलमा के बीच इल्मी बहस हुई। इस पर मुफ्ती आजम हिंद हजरत मुस्तफा रजा खां ने फतवा दिया था।  मुफ्ती काजी अब्दुर्रहमान बस्तवी की  किताब ‘रिसाला बैंक’ में इसका जिक्र  है। मौलाना अब्दुल्ला खां अजीजी ने ‘सूदी निजाम’ (सूद व्यवस्था) के नाम से किताब लिखी और इस्लामी बैंकिंग का तरीका भी सुझाया है।
रिजर्ब बैंक ऑफ इंडिया की ओर से जारी इस प्रस्ताव में इस्लामी बैंकिंग शुरू करने का दरगाह आला हजरत से जुड़े संगठन जमात रजा मुस्तफा ने स्वागत किया है। जमात के राष्ट्रीय महासचिव मौलाना शहाबुउद्दीन रजवी ने इसे अच्छा कदम बताते हुए कहा कि मुल्क में  एक बहुत बड़ा तबका गैर सूदी निजाम चाहता है। उलमा ने सरकारी बैंक से लेन देन को सूद नहीं माना। करोड़ों मुसलमानों की आबादी के अलावा और दूसरे ऐसे समुदाय हैं जो इस्लामी व्यवस्था के अनुसार किसी कंपनी से सूद का लेन देन नहीं चाहते।  पिछली सरकार के तत्कालीन प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह, पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम, और पूर्व अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री के रहमान खान से भी इस्लामी बैंकिंग सिस्टम की मांग की गई थी। उलमा और बुद्धिजीवियों ने एक प्रस्ताव बना कर पेश किया था। 
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बैंक से ब्याज न लेने वाले बरेली में भी
 सूफी टोला निवासी हसन आमिर का भट्टा है। कारोबार का सारा लेन देन बैंक से ही होता है। अपने पैसे पर मिलने वाले ब्याज को वह अपने और अपने परिवार पर खर्च नहीं करते। उस पैसों को खामोशी से किसी जरूरतमंद पर खर्च कर देते हैं। जो किसी की बेटी की शादी या किसी की बीमारी पर लग जाता है।    
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