महात्मा ज्योतिबा फुले रुहेलखंड विश्वविद्यालय ने गेहूं की दो नई किस्में तैयार की हैं। ये किस्में किसानों की आमदनी बढ़ाने और फसल को रोगों से बचाने में सहायक होंगी। विश्वविद्यालय के कृषि संकाय ने हरियाणा और दिल्ली की उन्नत किस्मों का संवर्धन कर इन्हें विकसित किया है।
कृषि संकाय ने हरियाणा की किस्म एचडी 2967 और दिल्ली की पूसा 226 का सफल संवर्धन किया है। ये दोनों आधार किस्में उच्च उत्पादकता और विपरीत मौसम में टिके रहने की क्षमता के लिए जानी जाती हैं। वैज्ञानिकों ने इन्हीं गुणों को बेहतर कर नई किस्में तैयार की हैं। इससे स्थानीय किसानों को उच्च गुणवत्ता वाला बीज मिलेगा। इस महत्वपूर्ण परियोजना का नेतृत्व कृषि संकाय के विभागाध्यक्ष प्रो. उपेंद्र कुमार बालियान कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय का उद्देश्य ऐसी फसल तैयार करना है, जिसमें किसानों को कीटनाशकों और दवाओं पर कम खर्च करना पड़े। शोध के दौरान गेहूं के पारंपरिक रोगों पर नियंत्रण पाने के लिए वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग किया गया है, जिससे फसल की रोग प्रतिरोधक क्षमता प्राकृतिक रूप से मजबूत हो सकेगी।
बीज की शुद्धता और व्यावहारिक अनुभव
बीज की शुद्धता और गुणवत्ता बनाए रखने के लिए विश्वविद्यालय ने विशेष तरीका अपनाया है। यहां गेहूं की फसल की कटाई हाथों से कराई जा रही है, जबकि आमतौर पर मशीनों का प्रयोग होता है। विशेषज्ञों का मानना है कि हाथ से कटाई करने से बीज सुरक्षित रहता है और मिलावट की आशंका नहीं रहती। इससे किसानों तक पहुंचने वाले बीज की अंकुरण क्षमता और गुणवत्ता शत-प्रतिशत बनी रहेगी। विश्वविद्यालय परिसर के वनस्पति उद्यान में तैयार फसल की देखरेख में छात्रों ने भी हिस्सा लिया, जिससे उन्हें किताबी ज्ञान के साथ व्यावहारिक अनुभव भी मिला।