प्लांट की सफाई में अगर सावधानी बरती गई होती तो तीन जिंदगियां खत्म नहीं हुई होतीं। प्लांट का ढक्कन बंद रहने से अंदर मीथेन गैस बन गई। और महज 20 मिनट पहले ही ढक्कन खोले जाने की वजह से आक्सीजन भी नहीं थी। मजदूरों और प्लांट मालिक को इसकी जानकारी ही नहीं थी। इसलिए जैसे ही वह अंदर गए मीथेन गैस ने बेहोश किया और आक्सीजन न होने से उनका दम घुट गया। बंद टैंक में यह गैस किस कदर खतरनाक हो सकती है इसका अंदाजा इस बात से ही लगा सकते हैं कि तीनों को कुछ बताने तक का मौका नहीं मिला।
केमिकल इंजीनियर और चंदौसी के हिंदुस्तान मिंट के प्लांट विशेषज्ञ लोकेश वार्ष्णेय से अमर उजाला ने इस हादसे के बाबत बात की। उन्होंने बताया कि हादसा कम जानकारी और लापरवाही की वजह से हुआ। प्लांट के नीचे कैलेंडरी में पुराना पानी भरा रहा होगा। इसी पानी की वजह से टैंक में मीथेन गैस बन जाती है। इस गैस की वजह से कुछ रिएक्शन होते हैं जिसकी वजह से टैंक में आसपास का आक्सीजन खत्म हो जाता है। जब मजदूर नीचे पहुंचा तो मीथेन गैस की वजह से बेहोश हुआ और आक्सीजन नहीं था इसलिए दम घुटने की वजह से तत्काल मौत हो गई। उसको बचाने उतरे लोग भी यह नहीं जानते थे कि आक्सीजन अंदर खत्म हो चुकी है और वही हुआ एक के बाद एक मौत हो गई।
क्या हुई गड़बड़ी
प्लांट के तीन पार्ट होते हैं। टैंक उसके नीचे कैलेंडरी और सबसे नीचे भट्ठी। किसान अक्सर सीजन खत्म होने पर प्लांट बिना सफाई के बंद कर देते हैं। कैलेंडरी में पानी भरा गया होता है। यही पानी मैंथा ऑयल निकालने के काम आता है। जब काम खत्म हो जाता हो तो इस पानी को निकाल देना चाहिए और टैंक पूरी तरह साफ करके बंद कर देना चाहिए। लेकिन ऐसा नहीं किया गया। सफाई न होने से मीथेन गैस बनी और यह हादसा हुआ।
क्या करना चाहिए
प्लांट बंद करते समय ही उसका पानी निकालकर टैंक को पानी से धोकर बंद करना चाहिए। जब नये सीजन में प्लांट चालू करने का वक्त आए तो प्लांट शुरू करने से दो दिन पहले ही टैंक का ढक्कन खुला छोड़ देना चाहिए। इससे गैस निकल जाती है और सफाई का मौका मिल जाता है।