नेपाल में भूकंप के शिकार हुए मौलाना समशुल कादरी अजहरी के दिल में अभी भी दहशत कायम है। न तो वह वहां के हालात के बारे कुछ बता पा रहे थे और न ही दिल के दर्द को बयां कर पा रहे थे। कई बार पूछने पर बमुश्किल कुछ बातें जुबान से निकली जो दिल को हिला देने वाली थीं। उन्हें इस बात का सबसे अधिक मलाल है कि यदि वह अपनी मां की बात मानते तो पत्नी और बच्चे को नहीं खोते।
मौलाना समशुल मूल रूप से उत्तर प्रदेश के शोहरत गढ़, सिद्धार्थनगर जिले के निवासी हैं। फिलहाल वह काठमांडू की कश्मीरी जामा मस्जिद के इमाम हैं। वह चैन तलाशने यहां दरगाह आला हजरत पर आए और अपने पीर ताजुश्शरिया मुफ्ती अख्तर रजा खां (अजहरी मियां) से मिल कर रो पड़े। इसी दौरान उनसे मुलाकात में जब कुछ जानने की कोशिश की गई तो हर शब्द उनके गले में रुंध जा रहे थे। बताया कि भूकंप क्या वह तो कयामत का एक मंजर था। मकान ताश के पत्तों की तरह गिर रहे थे। सड़के कागजों की तरह फट रही थीं। हर तरफ लोग सिर्फ जान बचाते भाग रहे थे। अलबत्ता जामा मस्जिद सहित आसपास की कुछ और इमारतें जरूर बची रहीं।
उन्होंने बताया कि उनकी आंखों के सामने कुछ लोग जमीन में समाए जा रहे थे तो कुछ पानी के बहाव में बह गए। जामा मस्जिद के मदरसे के 47 छात्र अभी भी तापता हैं। उनसे पढ़ने आने वाले दो बच्चे निसार और खालिद को उन्होंने बचाया, मगर घर में मौजूद अपनी पत्नी और तीन साल के बच्चे को वह न बचा पाए। उनका मकान भी ढह गया था। चार साल पहले ही उनकी शादी हुई थी।
मौलाना समशुल ने बताया कि वह जब काठमांडू जा रहे थे तो उनकी मां ने मना किया था। उन्होंने कहा था कि इतनी दूर न जाओ और यहीं कोई जरिया बना लो। लेकिन नई जगह पर कुछ नया करने की कोशिश और लोगों की खिदमत का जज्बा लेकर वह नेपाल चले गए। क्या पता था जाने के आठ महीने बाद ही सब कुछ खत्म हो जाएगा। उनका कहना है कि अब नेपाल जाने का कोई इरादा नहीं है।