बरेली। दुनिया में बढ़ती एकाधिकारीवादी सत्ता और तकनीक आधारित कृत्रिम स्मृति भाषा के लिए खतरा बन रही हैं। भाषा समाज की आधारशिला है। इसके टूटने से समाज बिखर जाएगा। दो दशक में दुनिया की चार हजार भाषाओं के विलुप्त होने का अंदेशा है। ये बातें प्रख्यात भाषाविद प्रो. जीएन देवी ने रविवार को विंडरमेयर ऑडिटोरियम में कहीं।
जन संस्कृति मंच की ओर से आयोजित वीरेन डंगवाल स्मृति व्याख्यान में ''''तहजीब, जुबान और दुनिया का भविष्य'''' विषय पर बोलते हुए प्रो. देवी ने कहा कि फासीवादी प्रवृत्ति लोगों के आर्थिक सवालों को आगे कर उनकी राजनीतिक इच्छाशक्ति को कमजोर करती है। मीडिया जनता की आवाज सत्ता तक पहुंचाने के बजाय सत्ता की बात जनता तक पहुंचाने का माध्यम बन रहा है। भाषा सिर्फ शब्दों का समूह नहीं, बल्कि इंसानी सभ्यता और सामाजिक संबंधों की नींव है। तकनीक के बढ़ते प्रभाव से लोग मातृभाषा से दूर हो रहे हैं।
उन्होंने कहा कि लोग समाज के कम और नेटवर्क के सदस्य अधिक बन गए हैं। युवा आंदोलनों का उल्लेख करते हुए बोले, नई भाषा नए शब्दों से नहीं, बल्कि नए सवालों से बनती है। जंतर-मंतर जैसे आंदोलनों ने साबित किया कि समाज सत्ता से सवाल पूछने की क्षमता रखता है।
भाषाई विविधता दबाएं नहीं, बनाएं गर्व का विषय
प्रो. देवी ने जनगणना में भाषाओं के वर्गीकरण और संविधान की आठवीं अनुसूची की मौजूदा व्यवस्था को अवैज्ञानिक बताते हुए कहा कि भाषाई विविधता को दबाने की कोशिश नहीं होनी चाहिए। इसे गर्व का विषय माना जाना चाहिए। वरिष्ठ पत्रकार एवं अनुवादक प्रभात सिंह ने संस्मरण साझा करते हुए कहा कि उन्होंने वीरेन डंगवाल को कवि और पत्रकार से अलग व्यक्तित्व रूप में जाना है। बड़प्पन का आतंक नहीं दिखाया। ऐसा व्यवहार किया, जैसे कोई हम उम्र व्यक्ति हो। कार्यक्रम की अध्यक्षता जहूर आलम, संचालन युवा आलोचक प्रेमशंकर ने किया।
श्रोताओं के सवालों के दिए जबाव
प्रोफेसर ने श्रोताओं के सवालों के विस्तृत जवाब भी दिए। कार्यक्रम के दूसरे सत्र में वरिष्ठ कवि राजेश सकलानी, पंकज चतुर्वेदी, प्रतिभा कटियार, आशु मिश्र, संदीप तिवारी, जुबैर सैफी, शिवांगी गोयल, केतन यादव, पूजा, मृत्युंजय, शिव त्रिपाठी, दानिश, अजय चौहान ने काव्यपाठ किया। संचालन कवयित्री अनुपम सिंह ने किया। संगठन के महासचिव मनोज कुमार सिंह ने सभी का आभार जताया।