बरेली। नाग पंचमी हो या दशहरा का त्योहार, अब शहर के अखाड़े गुलजार नहीं होते। कभी शहर में ही आठ-दस अखाड़े हुआ करते थे। अब इनकी संख्या सिमटकर एक-दो ही रह गई है। पहले यहां से शारिक, इरफान जैसे बड़े पहलवान देश में शहर का नाम रोशन कर चुके हैं, पर अब अखाड़ों में सिर्फ यादों का दंगल होता है। जिले में कुश्ती के 100 से अधिक खिलाड़ी पंजीकृत हैं, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर कोई भी अपना दबदबा कायम नहीं कर सका है।
कुश्ती का खेल बेहद रोमांचकारी होता है। इसे देखने के लिए लोग काफी उत्साहित रहते हैं। ओलंपिक में भी भारतीय पहलवानों का प्रदर्शन ठीक-ठाक रहा है, लेकिन जिले में इस खेल को आगे बढ़ाने के लिए संसाधनों का अभाव है।
रुहेलखंड केसरी उस्ताद अजीज ने जिंदा रखी परंपरा
वर्ष 1916 में बरेली में गुलाब अखाड़े की नींव रखी गई थी। यहां के पहलवानों ने पूरे देख में अखाड़े का नाम रोशन किया । बाद में अजीज पहलवान ने प्रशिक्षण देना शुरू किया। उन्होंने बताया कि वह 11 साल की उम्र से ही पहलवानी करने लगे थे। 35 साल की उम्र में उन्होंने पहलवानी छोड़ प्रशिक्षण देना शुरू कर दिया। अखाड़े में सभी धर्मों के पहलवान दांव-पेच सीखने आते हैं। अजीज पहलवान ने निसार, खलीफा पप्पू, इरफान, शारिक, उस्मान , मिंटू गुर्जर, मनोज शर्मा, हकीम गुर्जर, सुनील यादव, सर्जन, अयूब, भूरा मुन्ना समेत कई अन्य पहलवानों को तैयार किया है। गुलाब अखाड़ा पिछले कई वर्षों से जमालउद्दीन घोसी की सरपरस्ती (अध्यक्षता) में चल रहा है।
जिले के 15 खिलाड़ी ही हैं लाइसेंस धारक
कुश्ती संघ के सचिव के मुताबिक जिले में 60 से अधिक खिलाड़ी हैं, लेकिन लाइसेंसधारक केवल 15 ही हैं। दरअसल, कुश्ती के खिलाड़ियों को प्रदेश की ओर से लाइसेंस जारी किया जाता है।