बरेली। शरीयत के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने जो बात कही है वह कोई नई बात नहीं है। बल्कि शरई प्रक्रिया को बल देती है। फतवा हमेशा से बाध्यता नहीं रहा है।
यह बात आरटीआई एक्टीविस्ट मो. खालिद जीलानी एडवोकेट ने कहा है। इसके अलावा शरीयत को गैर कानूनी घोषित करने की याचिका को खारिज करने और फतवे जारी करने की प्रक्रिया को गैर कानूनी न मानने की सराहना की है। साथ ही यह कहना कि फतवे का उपयोग अगर कम्युनिटी वेलफेयर के लिए किया जाता है तो यह बेहतर है इससे दो पक्षों के बीच आपसी विवाद को सुलझाने में मदद मिलती है। यह बात भी स्वागत योग्य है।
इसके अलावा आल इंडिया मोमिन कांफ्रेंस की बैठक मेें वकील शिव लोचन मदान याचिका को खारिज करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले सम्मान किया गया। इसमें अध्यक्षता करते हुए मंडल उपाध्यक्ष साबिर मियां ने कहा कि शरई अदालतें अपने आप कोई फैसला नहीं करती बल्कि कुरान और हदीस में अल्लाह ने फरमान जारी किए हैं कि किस जुर्म की क्या सजा है वही बताती हैं। बैठक में मो. अय्यूब अंसारी, मो. शफी अंसारी, मो. हसीन अंसारी, नसीर अंसारी आदि ने भी विचार व्यक्त किए।