बरेली। हाथ से मैला उठाने पर पूरे देश में भले ही छह दिसंबर 2013 से लागू नए अधिनियम के अनुसार पूर्ण पाबंदी लग गई लेकिन अफसर इसे भूल गए। लागू होने के सात महीने बीत गए चार महीने पहले शासनादेश भी सारे जिलों को पहुंच गया लेकिन उसके अनुसार निगरानी समिति का गठन नहीं किया। बिना कुछ किए जिम्मेदार अधिकारियों ने मैला ढोए जाने की कुप्रथा खत्म होने का प्रमाणपत्र शासन को भेज दिया।
मुख्य सचिव ने समिति गठन का आदेश फरवरी 2014 में जारी किया लेकिन समाज कल्याण विभाग के अफसर इसे फाइलों में दबा गए। अब अमर उजाला के खुलासे के बाद अफसरों ने इस अधिनियम की सुध ली। कमेटी के गठन का प्रस्ताव जिला समाज कल्याण अधिकारी को डीएम के समक्ष रखना था लेकिन उन्होंने प्रस्ताव नहीं रखा। इसी कमेटी को मैला ढोने वालों के पुनर्वास और शुष्क शौचालयों को स्वच्छ शौचालयों में तब्दील कराने की जिम्मेदारी है।
सीडीओ भगवान सिंह ने बुधवार को जिला समाज कल्याण अधिकारी उमेश द्विवेदी को इस बाबत पूछताछ की और बृहस्पतिवार तक आख्या मांगी। सीडीओ ने उन्हें एक दिन में कमेटी का गठन कराकर अगले दो दिन में मीटिंग भी कराने की हिदायत दी है। टालमटोल अब भी जारी है। इस बाबत जब जिला समाज कल्याण अधिकारी उमेश द्विवेदी से बात की गई तो उनका कहना था कि जिला सर्वेक्षण समिति का गठन जिला समाज कल्याण अधिकारी (विकास) को करना है। हालांकि उमेश के पास इस पद का भी प्रभार कई दिनों तक रहा है और इस वक्त भी है।
‘जिला समाज कल्याण अधिकारी उमेश द्विवेदी से बृहस्पतिवार को कमेटी के बारे में आख्या मांगी है। लापरवाही पाई गई तो उनके खिलाफ कार्रवाई के लिए शासन के पत्र लिखा जाएगा।’
भगवान सिंह, सीडीओ
मैला ढोने वालों को देंगे नए काम का प्रशिक्षण
कमिश्नर बोले, गलत रिपोर्ट देने वालों पर होगी कार्रवाई
अमर उजाला ब्यूरो
बरेली। बिथरी के दो गांवों में मैला ढोए जाने की पुष्टि होने पर प्रशासन ने सभी जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई होगी। कमिश्नर ने बुधवार को स्पष्ट किया कि मैला ढोने वालों पर कार्रवाई नहीं होगी बल्कि उनका पुनर्वास कराया जाएगा। दोनों गांवों में सिर पर मैला ढोने वाले जितने भी लोग मिले हैं, उन्हें अन्यत्र बसाया जाएगा। जो सिर पर मैला ढुला रहे थे, उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई होगी।
कमिश्नर के रविंद्र नायक ने कहा कि इस प्रथा के पूरी तरह बंद होने और न होने का सर्टिफिकेट देने वालों पर नियमानुसार कार्रवाई कराई जाएगी। चिन्हित किए गए मैनुअल स्कैवेंजर्स को उनकी रुचि के कार्य का एक माह का प्रशिक्षण दिया जाएगा। स्वरोजगार शुरू करने के लिए सरकारी मदद दी जाएगी। उन्होंने कहा कि बिथरी ही नहीं बल्कि पूरे जिले में चोरी-छिपे चल रही इस कुप्रथा का 15 दिन से एक महीने में पता करने और मैला ढुलाने वालों पर मुकदमा कराने के निर्देश दिए गए हैं। उनके शुष्क शौचालय तुरंत नष्ट कराकर जलबंध शौचालय बनवाने के लिए कहा जाएगा।
उधर, जिलाधिकारी संजय कुमार ने भी कहा कि सिर पर मैला ढोने की कुप्रथा बंद होने का प्रमाणपत्र देकर सरकार को विश्वास दिलाने वालों पर कार्रवाई होगी। अगर सर्टिफिकेट देने के बाद भी गांव में दुबारा यह कुप्रथा चालू हो गई तो भी जिम्मेदार अधिकारियों को प्रशासन को सूचित करना चाहिए था। यह भी जांच कराई जा रही है कि ब्लाक स्तरीय अधिकारी कैसे निगरानी कर रहे थे।
यह होना था
नगर निगम को दो माह, नगर पालिका और पंचायतों को एक माह में मैला उठाने वालों (मैनुअल स्कैवेंजर्स) को चिन्हित करना
चिन्हित लोगों का विभिन्न योजनाओं में पुनर्वास के लिए फोटो युक्त पहचान पत्र जारी करना
भारत सरकार की एसआरएमएस योजना के तहत स्वरोजगार के लिए 40 हजार रुपये की सहायता
स्थानीय प्राधिकारियों की ओर से अस्वच्छ शौचालयों का सर्वे और स्वच्छ शौचालयों का निर्माण
अस्वच्छ शौचालय का के निर्माण और उपयोग करने पर कानूनी कार्रवाई
मैला उठवाना और उठाना संज्ञेय तथा गैर जमानती अपराध, एक साल की सजा और जुर्माना
यह होंगे कमेटी में
डीएम पदेन अध्यक्ष, जिला समाज कल्याण अधिकारी (विकास) सदस्य सचिव, सदस्य के रूप में जिला सांख्यिकीय अधिकारी, डूडा के परियोजना अधिकारी, जिला पंचायत राज अधिकारी, स्थानीय निकायों के अधिशासी अधिकारी, रेल प्राधिकरण का एक प्रतिनिधि, हाथ से मैला उठाने वाले कर्मियों और सफाई कर्मचारियों के कल्याण के लिए कार्यरत गैर सरकारी संगठनों के दो प्रतिनिधि और सामुदायिक प्रतिनिधि कमेटी के दो सदस्य
फोटो---02एमआरजेडपी---
मीरगंज में ऐसे कई गांव हैं
अमर उजाला ब्यूरो
मीरगंज/दुनका। दुनका में हर सड़क-गली में गंदे कपड़े से मुंह ढांके, बगल में मैला की टोकरी दबाए, झाड़ू-पंजा लिए वाल्मीकि परिवारों की दर्जनों औरतें आपको दिख जाएंगी। खुद ग्राम प्रधान कौसर जहां भी इस बदबूदार सच की तस्दीक कर करती हैं। बोलीं हां, लगभग 150 मजदूरपेशा-गरीब घरों में अभी भी उठाऊ शौचालय हैं। 200 स्वच्छ शौचालयों के निर्माण के लिए डीपीआरओ को लिखा भी है। उनके बनने का इंतजार है।
शीशगढ़-धनेटा रोड पर बसे गांव बसई की प्रधान क्रांतिदेवी बताती हैं कि 50 परिवारों में शुष्क (उठाऊ) शौचालय हैं। छह-सात परिवारों की औरतें साल-दर-साल से सिरों पर मैला ढो रही हैं। वर्ष 2013-14 में बसई के मजरा अंबेडकर ग्राम जोखनपुर में जरूर 50 जल प्रवाहित शौचालय बने, लेकिन बसई में पैसा न आने से एक भी नहीं बन पाया। बकैनिया वीरपुर में तो 90 फीसदी घरों के लोग शौच के लिए जंगल में जाते हैं। वर्ष 2013-14 में दुनकी, सुल्तानपुर, बकैनिया मजरों में 62 शौचालय बनवाए गए। प्रधान राजकुमारी ने शासन से 750 शौचालय मांगे हैं। यही हाल कुंवर खानदान के पैतृक गांव सहोड़ा का भी है। अरसे से सिर पर मैला ढो रही सुनीता वाल्मीकि की मानें तो तीन दर्जन घरों में उठाऊ शौचालय हैं। सुनीता बोली-मैला न ढोए तो जजमानी टूट जाएगी। हर घर से छमाही पर बीस-बीस किलो गेहूं-धान मिलना तो बंद होगा ही, शादी-ब्याह में काम मिलना भी रुक जाएगा। अगर सिर पर मैला ढोना जुर्म है तो हमारे लिए इज्जतदार दूसरे काम का इंतजाम क्यों नहीं करती सरकार? धर्मपुरा, गनेशपुर समेत उठाऊ शौचालय वाले गांवों की फेहरिस्त बहुत लंबी है।
वर्जन...
गांवों में शौचालय निर्माण का जिम्मा पंचायतीराज विभाग का है। लिहाजा कहां कितने शौचालय बने हैं या क्यों नहीं बने? इस बारे में जो कुछ पूछना है, डीपीआरओ से ही पूछिए, वही बताएंगे।
अतर सिंह, बीडीओ शेरगढ़
फोटो...
आंवला नगर पालिका में ढोया जा रहा मैला
आंवला। आदर्श नगर पालिका का तमगा थामे आंवला तहसील मुख्यालय के नाक के नीचे सिर पर मैला ढोने की कुप्रथा कायम है। नगर के मुहल्ला कच्चा कटरा, ताडगंज, तहसील, इंदिरा नगर, स्टैट बैंक के समीप, तलैया मुहल्ला, बख्खर मुहल्ला, पुरैना ढाल, अनुपुरा, भुर्जीटोला आदि मुहल्लों में करीब दो दर्जन से अधिक लोग मैला उठाने का काम करते हैं। नगर पालिका के सर्वे में करीब चार सौ घरों में शौचालय नहंीं बने थे और मैला उठाने वालों 21 लोग सामने आए थे। सूची शासन को भेज दी गई थी। सिर पर मैला ढोने को संज्ञान मे लेते हुये नगर पालिका के अधिशासी अधिकारी को एसडीएम रजनीश राय ने पत्र लिखकर चेतावनी दी कि सिर पर मैला ढोते हुये कोई मिला तो उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज करवाया जाएगा।
आलमपुर गजरौला में यही हाल
बिथरीचैनपुर।बिथरीचैनपुर ब्लाक के आलमपुर गजरौला गांव में भी सिर पर मैला उठाया जा रहा है। इस गांव में तीन सौ उठाऊ शौचालय हैं। मैला उठाने के काम में वर्षों से चार महिलाएं विमला, मुन्नी, नत्थिया और प्रेमा मैला ढो रही हैं। इनका कहना है कि पेट की खातिर वह यह काम करती हैं।य बीडीओ से मांगे हैं।