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‘भाषा में सबसे ज्यादा समृद्ध प्रेमचंद’

Sat, 31 May 2014 05:38 AM IST
Bareilly
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बरेली। मेरे हिसाब से भाषा में प्रेमचंद से ज्यादा समृद्ध भारत में दूसरा लेखक नहीं मिलता है। उनके गोदान, कर्मभूमि को मैं हिंदी के शब्द कोश की तरह इस्तेमाल करता हूं। साहित्यकार प्रह्लाद रामशरण भारत के साहित्य को कुछ इस तरह से देखते हैं। बृहस्पतिवार को बरेली आए मॉरिशस के साहित्यकार एवं इतिहासकार प्रह्लाद रामशरण ने फ्रेंच, हिंदी और अंग्रेजी साहित्य की स्थिति पर अमर उजाला से बातचीत की। शुक्रवार को मानव सेवा क्लब की ओर से आयोजित होने वाले शांति सुरेंद्र बहादुर साहित्य सम्मान समारोह में उन्हें सम्मानित किया जाएगा।
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चार पीढ़ियों से पहले प्रह्लाद रामशरण के पूर्वज बिहार के आरा जिले में रहते थे। इतिहासकार रणजीत पांचाले के घर पर हुई मुलाकात में उन्होंने बताया कि चार पीढ़ियों से मॉरिशस में रहने की वजह से अब उन्हें भारत और मॉरिशस की दोहरी नागरिकता भी मिल चुकी है। वह समय-समय पर भारत आते रहते हैं। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से ही ग्रेजुएशन किया है। बोले, मॉरिशस में फ्रेंच, अंग्रेजी क्रेयोल, हिंदी और भोजपुरी ज्यादा बोली जाती है। फ्रेंच भाषा ज्यादा डॉमिनेटिंग है, इसलिए सबसे ज्यादा वही बोली जाती है। कार्यालयी भाषा अंग्रेजी है। अंग्रेजी, फ्रेंच और हिंदी इन तीनों के साहित्य में वह किसे ज्यादा समृद्ध मानते हैं, पूछने पर उन्होंने कहा कि फ्रेंच साहित्य ज्यादा समृद्ध है। पहला विश्वकोश फ्रेंच में ही लिखा गया, जबकि तब भी सबसे ज्यादा अंग्रेजी ही बोली जाती थी। सबकी अपेक्षा फ्रेंच ज्यादा मीठी भाषा है। उसमें व्याकरण हिंदी की तरह ही इस्तेमाल होता है।
प्रह्लाद रामशरण मॉरिशस में 1974 से 97 तक शिक्षा अधिकारी भी रहे हैं। मॉरिशस और भारत की शिक्षा व्यवस्था को किस तरह से देखते हैं। इस पर उन्होंने कहा, मॉरिशस की अपेक्षा भारत की शिक्षा बहुत सस्ती है। यही वजह है कि मॉरिशस से भारत में पढ़ाई करने के लिए विद्यार्थी आते थे। बोले, 1970 तक मॉरिशस में कोई भी शिक्षा मुफ्त नहीं थी, 70 के बाद यूनिवर्सिटी लेवल की शिक्षा मुफ्त हो गई है। कहा, जब मैं भारत में पढ़ने आया तो मैंने हिंदी पढ़ने के लिए इंडियन हाई कमीशन से स्कॉलरशिप के लिए पत्र लिखा। लेकिन, उस समय तक स्कॉलरशिप नहीं मिलती थी, इसलिए मुझे कुछ नहीं मिला। इसके बाद मैं अपने खर्च पर भारत पढ़ने आया, लेकिन उस पत्र पर कार्रवाई दो साल के बाद हुई। दो साल बाद हिंदी पढ़ने के लिए स्कॉलरशिप भी मिलने लगी।
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भारत है दर्शनीय स्थल
बरेली। आखिर मॉरिशस के साहित्यकार प्रह्लाद रामशरण बार-बार भारत क्यों आते हैं, उन्होंने दोहरी नागरिकता में भारत को ही क्यों चुना! इस सवाल का जवाब देते हुए बोले, एक तो मेरे पूर्वज यहीं के थे, दूसरे भारत हिंदू धार्मिक नगरी है। बनारस, हरिद्वार, पुष्कर यह सब हिंदुओं के बड़े स्थल हैं। भारत के लोग मॉरिशस में ज्यादा रहते थे। वहां पर भी लोगों ने मंदिर और गंगा तालाब बनाया है। वहीं पर धार्मिक रीति रिवाज पूरे किए जाते हैं।
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बरसों बाद खोज पाए अपना गांव
बरेली। मॉरिशस के साहित्यकार प्रह्लाद रामशरण के पूर्वज बिहार के आरा जिले के दनउआ गांव के रहने वाले थे। उन्होंने बताया कि वह जब भारत आए तो उन्होंने महात्मा गांधी संस्थान बनारस में इस बात की खोज करनी शुरू कि दनुआ गांव कहां है, लेकिन उन्हें कोई नहीं बता पाया। इसके बाद वह आरा भी गए, लेकिन वहां भी कोई नहीं बता गया। बोले, कुछ बुद्धिजीवियों ने बताया कि दनुआ नहीं तनुआ गांव है। बोले, लेकिन कुछ सालों बाद मुझे गांधी संस्थान से ही पता चला कि वह दनुआ नहीं दनउआ है। उसको ढूंढ़ने के बाद काफी खुशी हुई।
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