बरेली/बदायूं। मुकुल गुप्ता के एनकाउंटर के करीब सात साल पुराने मामले में नया मोड़ आ गया है। बरेली के मौजूदा एसएसपी जे. रविंद्र गौड़ के खिलाफ मुकदमे की अनुमति न देने पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की बेंच ने प्रदेश के गृह सचिव से 30 अप्रैल तक जवाब-तलब करते हुए पूछा है कि आखिर इसके लिए क्यों न उनके खिलाफ कार्रवाई की जाए। उच्च न्यायालय के रुख से गौड़ के फिर से मुसीबत में फंसने के आसार हैं।
बता दें कि 30 जून, 2007 को बदायूं निवासी एमआर मुकुल गुप्ता का तब बरेली में ट्रेनी आईपीएस जे. रविंदर गौड़ के नेतृत्व वाली पुलिस टीम ने एनकाउंटर कर दिया था। पिछले साल सीबीआई विवेचना में भी एनकाउंटर की सत्यता पर संदेह जताते हुए टीम को कटघरे में खड़ा किया गया था। इसके बाद मानवाधिकार आयोग ने खेद जताते हुए मुआवजे का चेक मुकुल के पिता रिटायर्ड इंजीनियर विजेंद्र गुप्ता को भेजा था।
अक्तूबर 2013 में सीबीआई ने लखनऊ के तत्कालीन एसएसपी गौड़ के खिलाफ मुकदमा चलाने की मंजूरी उत्तर प्रदेश सरकार से मांगी थी। गृह सचिव ने इस पर असहमति जताते हुए मुकदमा चलाने की मंजूरी देने से इंकार कर दिया था। इसके बाद विजेंद्र गुप्ता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उन्होंने याचिका डालकर अपने बेटे की हत्या के दोषियों पर कार्रवाई की मांग की थी। इसी पंद्रह अप्रैल को हाईकोर्ट के न्यायाधीश अरुण टंडन और अख्तर हुसैन खां की पीठ ने इस पर फैसला सुनाया था। अब इसकी प्रति भी गुप्ता के पास आ गई है। आदेश में गृह सचिव को 30 अप्रैल तक निजी शपथपत्र दाखिल करके केस के बारे में सरकार की स्थिति स्पष्ट करने को कहा गया है। पूछा गया है कि लोक सेवक के खिलाफ सीबीआई को मुकदमा चलाने की अनुमति क्यों नहीं दी गई? पीठ ने यह भी पूछा है कि आखिर क्यों न इस मामले में जिम्मेदार मानते हुए गृह सचिव के खिलाफ ही कार्रवाई की जाए।
---इंसेट
एनकाउंटर की कहानी
घटना के वक्त एएसपी गौड़ इस एनकाउंटर टीम के प्रभारी थे। टीम में उनके अलावा बरेली के सीबीगंज थाने के एसओ रहे विकास सक्सेना समेत 10 पुलिसकर्मी और भी थे। आरोप था कि मुकुल और उसके साथी शातिर बदमाश थे और बैंक लूटने जा रहे थे। सूचना मिलने पर टीम ने उनका पीछा किया। खुद के घिरने पर आरोपियों ने पुलिस टीम पर फायरिंग कर दी। इस पर सेल्फ डिफेंस में गौड़ के गनर गौरीशंकर विश्वकर्मा ने अपनी एके 47 रायफल से मुकुल को गोली मार दी। पुलिस ने एनकाउंटर की एफआईआर में इसका जिक्र किया है। हालांकि पुलिस की लाख कोशिश के बावजूद बरेली की दवा फर्म में काम करने वाले मुकुल को शातिर घोषित नहीं किया जा सका। मुकुल के खिलाफ बरेली से बदायूं तक कोई आपराधिक मामला दर्ज नहीं था।