बरेली। थायरॉयड की जांच के लिए टीएसएच टेस्ट का शोध करने वाले अंतरराष्ट्रीय नाभिकीय अनुसंधान संस्थान आगरा के अध्यक्ष पद्मश्री डॉ. डीके हाजरा ने दवा और तकनीक के पेटेंट का विरोध किया है। उनका कहना है कि पेटेंट से शोध करने के लिए ग्रांट तो मिल जाती है, लेकिन दवाइयां महंगी होकर आम आदमी की पहुंच से दूर हो जाती हैं। ब्रेस्ट कैंसर में इस्तेमाल की जाने वाली एंटीबॉडी इसीलिए महंगी है क्योंकि उनका उनका पेटेंट हो चुका है।
एसआरएमएस में दीक्षांत समारोह में आए डॉ. डीके हाजरा ने खास बातचीत में बताया कि उनकी तकनीक से देशभर में टीएसएच की जांच हो रही है। उन्होंने बताया कि ब्रिटेन के उनके गुरु ने टी-थ्री, टी-फोर, फ्री टी-थ्री और फ्री टी-फोर की जांच की तकनीक पर शोेध किया था। डॉ. डीके हाजरा ने कहा कि उन्होंने इस तकनीक का पेटेंट नहीं कराया था इसीलिए यह दुनिया भर के लोगों को सहज और सुलभ उपलब्ध है।
डॉ. डीके हाजरा कैंसर के इलाज के लिए एडवांस तकनीक ‘रेडियो बायो कंजक्टिंग टॉरगेटिंग’ पर शोध कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि शुरुआती कैंसर पर तो इसका प्रयोग हो चुका है, लेकिन एडवांस स्टेज के कैंसर पर प्रयोग का प्रस्ताव भेजा जा रहा है। शासन से प्रस्ताव पास होने के बाद कैंसर के ऑपरेशन के बाद इस तकनीक का भी प्रयोग करने पर कैंसर के फैलाव को रोका जा सकेगा। यह एक तरह से टॉरगेटेड थेरेपी है। इससे सभी कैंसर सेल को टॉरगेट कर उन्हें नष्ट किया जाएगा। इससे कैंसर के इलाज में होने वाले दुष्प्रभावों को भी कम किया जा सकेगा।
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जेनेटिक डायबिटीज पर भी शोध
डॉ. हाजरा जेनेटिक डायबिटीज पर भी शोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि शोध के माध्यम से यह पता लगाया जाएगा कि एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में डायबिटीज कैसे पहुंच रहा है। इसे रोकने के उपाय भी खोजे जाएंगे।
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थायरॉयड के इलाज में आई क्रांति
डॉ. डीके हाजरा को न्यूक्लियर मेडिसिन के तहत थायरॉयड की जांच के लिए थायरॉयड स्टुमुलेटिंग हार्मोन (टीएसएच) परीक्षण की खोज की थी। टीएसएच के कारण थायरॉयड के इलाज में क्रांति आई है। थायरॉयड के स्तर का पता चलने से उन मरीजों का सुगम इलाज संभव हो सका, जो इसकी उम्मीद छोड़ चुके थे। भारत सरकार ने इस खोज के लिए उन्हें पद्मश्री से अलंकृत किया था।