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कहीं नहीं सुनी जा रही एक बेटी की आवाज

Fri, 10 Jan 2014 05:51 AM IST
Bareilly
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बरेली। वह महिला अनाथ है और मंदबुद्धि भी। शायद इसीलिए रेलवे अफसरों का दिल नहीं पसीजा। वरना 50 साल की उम्र में उसे मुफलिसी के दौर से नहीं गुजरना पड़ता। पिता के निधन के बाद मां को पेंशन मिल रही थी। मां भी चल बसीं तो इज्जतनगर रेल मंडल के अफसरों ने अपने ही कर्मचारी की बेटी को पेंशन देने में कानूनी पेंच लगा दिए। रेलवे अफसर आरटीआई का जवाब भी नहीं दे रहे हैं। इंसाफ के लिए अब मुख्य जन सूचना आयुक्त का दरवाजा खटखटाया गया है।
यह कहानी है जाकिर हुसैन की अनाथ बेटी शाहीन की। पुराना शहर काजी टोला निवासी और मंडल रेलवे मुख्यालय में माल बाबू जाकिर हुसैन 1971 में रिटायर हुए थे। 1997 में उनकी मृत्यु हो गई। करीब छह महीने बाद जाकिर हुसैन की पत्नी का भी इंतकाल हो गया। उनकी इकलौती बेटी शाहीन (50) अविवाहित रहते किसी तरह जीवन यापन कर रही है। मंदबुद्धि और शारीरिक रूप से भी बेहद कमजोर शाहीन को एक वक्त की रोटी के लिए पड़ोसियों की तरफ झांकना पड़ता था। अर्से बाद लागू छठे वेतन आयोग में तलाकशुदा या अवविवाहित बेटी को भी पिता की पेंशन का हक दिए जाने संबंधी सिफारिशों पर शाहीन की उम्मीद जागी।
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वह वर्ष 2011 मेें मंडलीय कार्यालय में गुहार लगाती रही, जिसे अफसरों ने हवा में उड़ा दिया। बेसहारा और निरक्षर शाहीन ने पड़ोसी नासिर अली के माध्यम से डीआरएम कार्यालय को बार-बार रिमाइंडर भेजे। संतोषजनक जवाब के बजाय अफसरों ने सूचना के अधिकार कानून के तहत जानकारी देने तक की आवश्यकता नहीं समझी। अब उसने अपनी माली और मानसिक हालत का उल्लेख करते हुए मुख्य जन सूचना आयुक्त को फैक्स भेजकर सूचना के अधिकार का इस्तेमाल कर इंसाफ दिलाने की मांग की है।

---कोट--
मामले में मुझे जानकारी नहीं है। प्रकरण की फाइल देखने के बाद ही कुछ कहा जा सकेगा। यदि मामला लंबित मिला, तब निश्चित रूप से प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी।
- राजेंद्र सिंह, जन संपर्क अधिकारी, मंडलीय रेल कार्यालय
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