गोधूलि बेला के बाद करें धनतेरस पूजा
बरेली। पंच उत्सव धनतेरस के साथ शुरू हो जाएगा और भाई दूज तक चलेगा। धनतेरस पर सुबह उठकर घर को साफ करें, फिर भगवान धनवंतरि की पूजा करें। मान्यता है कि इन दिनों सबके घर से दरिद्र भागते हैं और लक्ष्मी बरसती है।
आचार्य डॉ. वीके शर्मा के मुताबिक, धनतेरस को गोधूलि बेला के बाद पूजा का सबसे शुभ मुहूर्त है। पूजा के बाद शाम के समय दरवाजे पर दीपदान करें। चारों दिशाओं में दीप जलाएं। दरवाजे पर दीपदान करने का सिलसिला भाई दूज तक जारी रखें। इसके साथ ही तुलसी के पौधे की भी पूजा करें। घर की पुरानी और बेकार हो चुकी चीजों को हटाकर नई चीजें खरीदें। टूटे-फूटे बर्तनों को हटाकर नए बर्तनों में पूजा करें। इसके अगले दिन महालक्ष्मी पर नरक चतुर्दशी में घर की सफाई कर दरिद्र को भगाएं और यमराज के लिए दीप दान करें। तेल मालिश के बाद स्नान करें। इस दिन हनुमान जी की जयंती भी मनाई जाती है। इसी दिन भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर नाम के असुर को मारा था।
नरक चौदस के अगले दिन मंगलवार को बड़ी दिवाली है। इस दिन रावण के वध के बाद श्रीराम अयोध्या लौटने पर अयोध्यावासियों ने दीप जलाकर नगर को सजाया था। समुद्र मंथन में दिवाली के दिन ही महालक्ष्मी भगवान विष्णु को प्राप्त हुई थीं। रात आठ से 11 बजे तक सूर्य, गणेश, लक्ष्मी और सरस्वती की पूजा करें। गोधूलि बेला से लेकर रात 11 बजे तक गणेश-लक्ष्मी की पूजा का शुभ मुहूर्त है। समाज के सभी वर्गों का महालक्ष्मी पूजा में उचित स्थान होता है। तेली का तेल, कपड़े वाले के कपड़े, फल वाले फल, रंगाई-पुताई वाले रंग, कुम्हार के बर्तन हर वर्ग को लक्ष्मी की प्राप्त होती है। इस प्रकार सामूहिक उत्सव के रूप मनाते हैं। दिवाली वाले दिन दयानंद सरस्वती और महावीर स्वामी का निर्वाण दिवस भी है। इसे आर्य समाजी अपने ढंग से मनाते हैं। अगले दिन गोवर्धन की पूजा करते हैं। इसमें घर-घर में गोबर से गिरिराज बनाए जाते हैं। गाय, बछड़ा ग्वाला की पूजा होती है। मंदिरों में भगवान के लिए 36 व्यंजनों का भोग लगाया जाता है। इसके बाद भाई दूज मनाने के बाद इस पंच उत्सव का समापन होता है।