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नाड़ी परीक्षा से पहचानें रोग, आयुर्वेद से करें इलाज

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नाड़ी परीक्षा से पहचानें रोग, आयुर्वेद से करें इलाज - फोटो : अमर उजाला, बरेली
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बरेली। रोगों का पता लगाने के लिए न खून निकलवाने की जरूरत होती है न अपनी गाढ़ी कमाई खर्च करने की। सिर्फ नाड़ी परीक्षण से रोगों का पता लग सकता है। नाड़ी परीक्षा रोगों की पहचान करने की भारत की सैकड़ों वर्ष प्राचीन पद्धति है लेकिन अब लोग इससे अनभिज्ञ हैं। विज्ञान आधारित इस पद्धति में महारथ के लिए गहन साधना की जरूरत होती है। नागपुर के श्री आयुर्वेद कॉलेज के रोग निदान विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. डॉ. जीपी उपाध्याय ने यह बात कही।
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रविवार को ऑल इंडिया आयुर्वेद पीजी एसोसिएशन की ओर से एक होटल में ‘जनस्वास्थ्य में आयुर्वेद की उपयोगिता’ विषय पर आधारित राष्ट्रीय सेमिनार हुई जिसमें डॉ. अतुल वार्ष्णेय ने कहा कि एलोपैथ से तत्काल राहत के साथ दुष्प्रभाव भी दिखाई देते हैं, जिसका खामियाजा रोग के रूप में सामने आता है। मुख्य अतिथि मेयर उमेश गौतम और आयोजन सचिव डॉ. केपी सिंह आदि ने नई दिल्ली की प्रो. मंजूषा राजगोपाला, बीएचयू की प्रो. शिवानी गुप्ता, नागपुर के डॉ. जीपी उपाध्याय, प्रयागराज की प्रो. नीलम गुप्ता, लखनऊ से प्रो. एसएस वेदार, झांसी के प्रो. केएन यादव को सम्मानित किया गया। राष्ट्रीय सेमिनार में शोध विद्यार्थियों ने अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए। इस दौरान एसोसिएशन के डॉ. संतोष और डॉ. शांतुल गुप्ता व अन्य पदाधिकारी मौजूद रहे।

बरेली में नाड़ी परीक्षा के विशेषज्ञ की कमी
बरेली में नाड़ी परीक्षा के विशेषज्ञ नहीं हैं। सेमिनार में छात्रों को नाड़ी परीक्षा की ओर उन्मुख होने के लिए प्रोत्साहित किया गया। डॉ. उपाध्याय ने कहा कि गुजरात, महाराष्ट्र, केरल में सबसे पहले लोग नाड़ी परीक्षा कराते हैं। फिर आयुर्वेदिक उपचार कराते हैं। सर्जरी अथवा गंभीर परिस्थिति में ही इलाज के लिए एलोपैथ की ओर रुख करते हैं। कहा कि भारत की प्राचीन चिकित्सा प्रणाली शरीर की ऊर्जा को नुकसान पहुंचाए बगैर रोग खत्म करती है।
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