खिलाड़ी बेटियों को लगी माता-पिता के नजरिये की नजर
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बरेली। बेटियां आज भले ही हर क्षेत्र में खुद को बेटों से बेहतर साबित कर रही हों, लेकिन तमाम अभिभावकों का नजरिया आज भी दकियानूसी ही है। वे आज भी बेटियों को बाहर भेजने से कतराते हैं। स्पोर्ट्स स्टेडियम में चल रहे स्पोर्ट्स हॉस्टल के ट्रायल में समाज की यह सच्चाई एक बार फिर सामने आ गई। यहां स्टेट और नेशनल लेबल पर बेहतर प्रदर्शन कर चुकी कई लड़कियों के अभिभावकों ने उन्हें स्पोर्ट्स हॉस्टल भेजने से मना कर दिया। कोच और आरएसओ ने उनको समझाने की कोशिश भी की, लेकिन वे नहीं माने। वहीं, हॉकी व अन्य खेलों में चयनित ग्रामीण क्षेत्र की कई लड़कियों के अभिभावक उन्हें हॉस्टल भेजने को तैयार हैं। बता दें कि स्पोर्ट्स स्टेडियम में इन दिनों 16 खेलों में स्पोर्ट्स हॉस्टल के लिए मंडल स्तरीय ट्रायल चल रहे हैं। अब तक हॉकी, स्वीमिंग, जिम्नास्टिक और कुश्ती के ट्रायल हो चुके हैं। बालिका वर्ग में वॉलीबाल, फुटबॉल, बैडमिंटन और टेबल टेनिस के ट्रायल शनिवार को होंगे।
ट्रैक पर हांफ रहे खिलाड़ी
ट्रायल में शामिल 90 फीसदी खिलाड़ी फिजिकल में फेल हो रहे हैं। ये खिलाड़ी 50 में से बमुश्किल 5 से 10 अंक ही ला पा रहे हैं। जिला स्तर पर चयनित होकर आने वाले खिलाड़ियों का भी यही हाल है। इनमें भी आठ से दस फीसदी खिलाड़ी ही फिजिकल टेस्ट के मानकों पर खरे उतर पा रहे हैं। शुक्रवार को हुए चार खेलों के बालक वर्ग के मंडलीय ट्रायल में छह खिलाड़ी ही पास हो सके। 13 खिलाड़ी फेल हो गए। आरएसओ लक्ष्मी शंकर सिंह के अनुसार सौ नंबर के ट्रायल में पचास नंबर का फिजिकल और पचास नंबर का खेल व तकनीक का टेस्ट होता है। फिजिकल पास करने के लिए 20 नंबर चाहिए, लेकिन खिलाड़ी आठ से दस नंबर भी नहीं ला पा रहे हैं। शुक्रवार को वॉलीबाल में दो, बैडमिंटन में दो, टेबल टेनिस में एक और फुटबॉल ट्रायल में 14 खिलाड़ी शामिल हुए। इनमें छह खिलाड़ी ही फाइनल ट्रायल में प्रवेश पा सके।
स्टेडियम में प्रैक्टिस करने वाले कई अच्छे खिलाड़ी हैं। लड़कियों ने स्टेट और नेशनल लेबल की प्रतियोगिता में हिस्सा लिया। ट्रायल में उनका चयन भी हुआ, लेकिन कई अभिभावकों ने अपनी बेटियों को हॉस्टल भेजने से मना कर दिया है। हालांकि, ग्रामीण क्षेत्र की कुछ महिला खिलाड़ियों के अभिभावक उन्हें हॉस्टल भेजने को तैयार हैं। फाइनल ट्रायल के लिए भी उनका चयन हो गया है।
- लक्ष्मी शंकर सिंह, आरएसओ