बरेली। ‘संगीत में बांसुरी का अपना अलग ही मुकाम है। इसकी धुन दिलों पर सीधा असर करती है। चूंकि यह वाद्ययंत्र अध्यात्म से जुड़ा है और विशुद्ध रूप से भारतीय है, लिहाजा देश की परंपरा का हिस्सा है। भगवान कृष्ण की बांसुरी मेरी तो आत्मा ही बन गई है।’ यह कहना है बनारस घराने के प्रख्यात बांसुरी और शहनाई वादक पंडित राजेंद्र प्रसन्ना का। वह शुक्रवार को स्पिक मैके के कार्यक्रम में शिरकत करने बरेली पहुंचे।
प्रसन्ना ने बांसुरी के इतिहास का जिक्र करते हुए कहा कि बांसुरी का रिश्ता भगवान श्रीकृष्ण से रहा है, इसलिए वह भगवान का ध्यान लगाकर ही इसे सुर देते हैं। तब सुनने वालों को आनंद आता है। बोले- फूंक का यह साज मेरी आत्मा बन चुका है। शायद यही वजह है कि राजेंद्र प्रसन्ना का नाम देश के शीर्ष बांसुरी वादक गुरु पंडित हरि प्रसाद चौरसिया के बाद आकाशवाणी दिल्ली में दूसरे नंबर पर दर्ज है। लंदन में पिछले साल पंडित हरि प्रसाद चौरसिया के साथ एक कार्यक्रम में राजेंद्र प्रसन्ना को भी ग्रेमी अवार्ड से नवाजा गया। इसके अलावा राष्ट्रीय संगीत अकादमी अवार्ड उन्हें बांसुरी के साथ ही शहनाई वादन के लिए मिल चुका है। उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी अवार्ड समेत कई प्रतिष्ठित पुरस्कार भी उनके हिस्से में हैं। एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि आज संगीत में बांसुरी की स्थिति बहुत अच्छी है। बांसुरी जो पहले गिने चुने लोगों तक ही सीमित थी, आज लाखों हाथों में हैं। संगीत में रियाज की बहुत अहमियत है। जो रियाज करता है, वही लोगों के दिलों पर राज करता है। राजेंद्र प्रसन्ना यहां रुकने के दौरान खानकाह नियाजिया पर हाजिरी देने भी गए। वहीं अपने अजीज मित्र संगीत निर्देशक अजय इंडियन से मिलकर पुरानी यादों को ताजा किया।