टीबी रोगियों को ‘लूटा’ तो जाना पड़ेगा जेल
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बरेली। टीबी के खात्मे में निजी चिकित्सक, फार्मासिस्ट और झोलाछाप बड़ी चुनौती बन रहे हैं। तमाम कोशिशों के बाद भी इनसे इलाज करा रहे टीबी मरीजों की पहचान नहीं हो पा रही है। इस चुनौती से पार पाने के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन की गाइडलाइंस को शासन ने लागू करने के निर्देश दिए हैं। ज्वाइंट एफर्ट फॉर एलिमिनेटिंग ऑफ टीबी (जीत) प्रोजेक्ट लॉन्च किया है। इसके तहत जिला टीबी रोगियों की पहचान छिपाने वालों पर मुकदमा दर्ज कराया जाएगा।
जिला टीबी विभाग और सेंटर फॉर हेल्थ रिसर्च एंड इनोवेशन पाथ को मुहिम साकार करने की जिम्मेदारी सौंपी है। जिला क्षय रोग अधिकारी डॉ. एसके गर्ग ने बताया कि प्राइवेट प्रेक्टिस करने वाले डॉक्टरों से इलाज कराने वाले टीबी मरीजों को दवाइयों पर हजारों रुपये खर्च करने पड़ते हैं। ज्यादा खर्चे के कारण वे कई बार बीच में ही इलाज छोड़ देते हैं और उनके बारे में सरकारी महकमे को जानकारी नहीं मिल पाती। ये मरीज टीबी की रोकथाम में रोड़ा बने हैं। साथ ही प्राइवेट डॉक्टर भी इनसे जुड़े रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं कराते थे। बताया कि यदि कोई प्राइवेट डॉक्टर टीबी मरीजों की जानकारी छिपाता है और जांच में यह बात साबित हो जाती है तो उसके खिलाफ मुकदमा भी दर्ज कराया जा सकता है।
ऐसे काम करेगा प्रोजेक्ट
जीत प्रोजेक्ट के तहत शहर के प्राइवेट डॉक्टर्स को सेक्टरों में बांटा जाएगा। प्रत्येक सेक्टर में एक सेंटर बनेगा। जहां पर एक-एक कोऑर्डिनेटर तैनात होगा। फिर सर्वे होगा। प्रत्येक सेक्टर की टीम अपने-अपने सेक्टर में प्राइवेट डॉक्टर्स से संपर्क कर उनके यहां इलाज करा रहे टीबी रोगियों का डाटा कलेक्ट करेगी। डॉक्टरों को टीबी रोगियों को फ्री इलाज के लिए सरकारी अस्पताल भेजने को प्रेरित किया जाएगा।
ताकि हो मुफ्त इलाज
टीबी मरीज को बलगम की सीवी नॉट जांच के लिए प्राइवेट अस्पताल में तीन हजार से ज्यादा रुपये खर्च करने पड़ते हैं। वहीं, चलने वाले कोर्स के दौरान दवाओं पर भी हजारों रुपये खर्च करने पड़ते हैं। जबकि सरकारी अस्पतालों में यह सुविधा निशुल्क है। करीब दस लाख रुपये तक की दवा और सभी जांच मुफ्त कराने के उन्नत तकनीकी की मशीनें सरकारी अस्पतालों में उपलब्ध है।