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शहीद का दर्जा ही नहीं तो शहादत किस बात की

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बरेली। पुलवामा में सीआरपीएफ के 44 जवानों की ‘शहादत’ पर अर्द्धसैनिक बलों में ही सवाल उठ रहे हैं। अर्द्धसैनिक बलों के जवानों के बीच वायरल हो रहे एक सोशल मीडिया मेसेज के मुताबिक जब उन्हें सरकार शहीद का दर्जा ही नहीं देती तो पब्लिक के सामने उन्हें शहीद बताकर क्यों देश को गुमराह किया जा रहा है। पूर्व सैनिकों की ओर से सोमवार को एक ज्ञापन भी डीएम को दिया गया जिसमें प्रधानमंत्री से अर्द्धसैनिक बलों के जवानों को भी शहीद का दर्जा देने की मांग की गई है। कहा गया है कि ऐसा न हुआ अर्द्धसैनिक बलों के जवानों का मनोबल गिरेगा।
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एक्स सर्विसमैन वेलफेयर कोआर्डिनेशन कमेटी के अध्यक्ष सीपीओ जसवंत सिंह भाकुनी के मुताबिक देशवासी शहीद सैनिकों के प्रति सोशल मीडिया पर संवेदनाएं व्यक्त कर रहे हैं, लेकिन सबसे दुखद तो यह है कि इन सैनिकों को शहीद का दर्जा ही नहीं मिलेगा। जो राजनीतिक दल सियासी बयानबाजी कर रहे हैं, वे भी अच्छी तरह जानते हैं कि सरकारी कागजों में इन जवानों को शहीद नहीं लिखा जाएगा। एक्स सर्विसमैन कोऑर्डिनेशन कमेटी के एनडी पांडेय ने कहा कि भले ही प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, वित्तमंत्री जैसे देश के पहली पंक्ति के नेता अपने संबोधन में इन जवानों को शहीद कह रहे हों, लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में न इन जवानों को शहीद का दर्जा मिलेगा न उनके आश्रितों को सेना की तरह पेंशन मिल पाएगी।

कहां गया सर्कुलर
विश्वसनीय सूत्रों के मुताबिक करीब 15 दिन पहले एक सर्कुलर जारी होने की सूचना दी गई थी जिसके मुताबिक अर्द्धसैनिक बलों के जवानों को भी शहीद का दर्जा देने का आश्वासन दिया गया था। इससे पैरामिलिट्री फोर्स के जवानों और अफसरों में खुशी की लहर दौड़ गई, लेकिन 15 दिनों बाद भी यह सर्कुलर प्राप्त नहीं हुआ है। हालांकि सीएपीएफ के अधिकारी संभावना जता रहे हैं कि पुलवामा में आतंकी हमले के बाद सरकार उनके लिए जरूर कोई बेहतर कदम उठाएगी।
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सिर्फ सेना के जवान शहीद
पूर्व सैनिकों के मुताबिक सीमा पर अगर सेना और बीएसएफ के जवान की एक साथ भी दुश्मन की गोली से मौत हो तो शहीद का दर्जा सिर्फ सेना के जवान को मिलता है। पैरामिलिट्री केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल गृह मंत्रालय के अधीन है जिसमें सीआरपीएफ, बीएसएफ, आईटीबीपी समेत अन्य पैरामिलिट्री फोर्स आते हैं। वहीं, थल सेना, नौ सेना और वायु सेना रक्षा मंत्रालय के अधीन हैं।

इन्हें पेंशन तक नहीं
रिटायर्ड सार्जेंट राकेश विद्यार्थी के मुताबिक शहीद सेना के जवान के आश्रितों को नौकरी में कोटे के साथ शिक्षण संस्थानों में भी सीटें आरक्षित होती हैं। पैरामिलिट्री के जवानों को ये सुविधाएं नहीं मिलती हैं। पेंशन का लाभ भी नहीं मिलता। विद्यार्थी कहते हैं कि केंद्र सरकार दुख और निंदा के बजाय इन वीरों के बलिदान को उचित सम्मान देने के लिए ठोस कदम उठाए तो ज्यादा बेहतर होगा।
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