बरेली। डीपीआरओ विनय कुमार सिंह स्वच्छ भारत मिशन और 14वें वित्त की लाखों की रकम के जिन घोटालों के लिए एडीओ को दोषी ठहराते रहे, आखिरकार उनमें खुद ही फंस गए। कमिश्नर की ओर से कराई गई जांच में साबित हुआ कि डीपीआरओ ने 14वें वित्त की करीब 32 लाख रुपये की रकम ग्राम पंचायतों को देने के बजाय उसका खुद बंदरबांट कर लिया। इसके साथ स्वच्छ भारत मिशन के तहत ब्लॉकों में चहेतों की ऐसी गाड़ियां लगाकर कमीशन के तौर पर मोटी रकम लेकर लगाने का आरोप साबित हुआ है जिनका परमिट तक नहीं था। इस जांच में डीपीआरओ के खिलाफ गबन के और भी कई मामले सामने आए हैं। कमिश्नर ने डीपीआरओ के खिलाफ आरोपों की जांच रिपोर्ट शासन को भेज दी है।
डीपीआरओ विनय कुमार सिंह के खिलाफ गबन के तमाम मामलों की शिकायत शासन में पहुंची थी। शासन के आदेश पर कमिश्नर रणवीर प्रसाद ने इन सभी मामलों की जांच के लिए अधिकारियों की तीन सदस्यीय टीम गठित की थी। इस जांच में सामने आया है कि 14वें वित्त की रकम करीब 32 लाख रुपये की रकम डीपीआरओ की ओर से ग्राम पंचायतों को देने के बजाय उसका आहरण खुद कर लिया गया था। जांच रिपोर्ट के मुताबिक भुता में 14वें वित्त आयोग की 992200 रुपये की रकम के चेक अलग-अलग लोगों के नाम जारी किए गए और बाद में उसका पेमेंट करा लिया गया। मझगवां ब्लॉक में भी करीब 15 लाख रुपये का भुगतान ग्राम पंचायतों के खाते में करने के बजाय सेल्फ चेकों के माध्यम से कराकर खुद हजम कर लिया गया।
जांच में पता चला कि दमखोदा ब्लॉक में 14वें वित्त की 317200 रुपये की धनराशि खुद एडीओ पंचायत रहे विनोद व्यास ने निकाल ली। जांच अधिकारियों ने 14वें वित्त की धनराशि में 32 लाख 14 हजार 400 रुपये का गबन होने की पुष्टि की है। इसके अलावा स्वच्छ भारत मिशन के तहत जो वाहन लगाए गए हैं, उनका रजिस्ट्रेशन टैक्सी परमिट में था ही नहीं। विभाग में सरकारी वाहन उपलब्ध होते हुए भी डीपीआरओ ने मनमाने तरीके से इन वाहनों से अनुबंध करा लिया। जांच में भी यह सामने आया है कि इस अभियान में जो पांच वाहन लगाए गए थे, उनका अनुबंध समाप्त हो चुका था। इसके बावजूद नियमों का उल्लंघन करते हुए चहेती एजेंसी को वाहनों को उपलब्ध कराने का आर्डर दे दिया गया। जांच रिपोर्ट में डीपीआरओ के खिलाफ भ्रष्टाचार के कई और मामलों का भी जिक्र किया गया है।
कागज पर ट्रेनिंग कराकर खपा दिया 1.32 करोड़ का बजट
पंचायत राज विभाग का एक मामला यह भी सामने आया था कि पंचायत पदाधिकारी और पंचायत प्रतिनिधियों के प्रशिक्षण के लिए वर्ष 2017 और 2018 में दो करोड़ रुपये से ज्यादा की धनराशि विकास खंडों को दी गई थी। इसमें कागजों पर ही प्रशिक्षण देने की कार्रवाई पूरी कर बजट की रकम को ठिकाने लगा दिया गया है। इसमें मामले में भी कमिश्नर की जांच में इसमें 1.32 करोड़ की धनराशि के दुरुपयोग की पुष्टि की गई है।
एडीओ पंचायत के भाई की शिकायत पर शुरू हुई थी जांच
बरेली। एडीएम पंचायत योगेंद्र पाल सिंह के भाई दिनेश पाल सिंह ने 25 अगस्त 2018 को डीपीआरओ पर भ्रष्टाचार के तमाम आरोप लगाते हुए इसकी शिकायत की थी। डीपीआरओ ने बाद में एडीओ योगेंद्र के खिलाफ इज्जतनगर थाने में रिपोर्ट दर्ज करा दी। डीपीआरओ का कहना था कि उनकी जांच में एडीओ पंचायत पर वर्ष 2016-17 में पंचायत उद्योग खलीलपुर और बहेड़ी में व्यवस्थापक रहते हुए करीब 31 लाख रुपये का गबन साबित हुआ है। इसके बाद दिनेश पाल सिंह ने आरोप लगाया कि डीपीआरओ अपने खिलाफ शिकायत को दबाने के लिए उसके भाई योगेंद्र के खिलाफ सुनियोजित तरीके से कार्रवाई कर रहे हैं। डीपीआरओ की तरफ से कराई गई एफआईआर पर इसलिए भी सवाल खड़े हुए थे क्योंकि उन्होंने जांच के करीब एक साल बाद एडीओ पंचायत के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई थी। दिनेश पाल की शासन में भेजी गई शिकायत पर कमिश्नर ने भी मंडलीय टीम बनाकर जांच शुरू करा दी।
डीपीआरओ के खिलाफ शिकायत की जांच पूरी करके कमिश्नर को दे दी है। आगे की कार्रवाई शासन स्तर पर ही होनी है। इस बारे में ज्यादा कुछ नहीं बता सकता। - श्रीकृष्ण त्रिपाठी, संयुक्त विकास आयुक्त/ अध्यक्ष, मंडलीय जांच समिति