बरेली। पर्चे पर दवाएं लिखते वक्त ज्यादातर डॉक्टरों को इस बात से कोई सरोकार नहीं होता कि ये दवाएं मरीज को फायदा पहुंचाएंगी भी या नहीं, ज्यादा फोकस इस बात पर रहता है कि उन दवाओं को प्रिस्क्राइव करने से उनकी जेब में कितना मुनाफा पहुंचेगा। दवा कंपनियों का यह खेल कुछ ऐसा है कि बीमारी से ज्यादा मरीजों को महंगा इलाज भारी पड़ता है। कुछ दिनों पहले अमर उजाला में प्रकाशित खबर ‘साल भर पेट काटा और अब सैर सपाटा’ से प्रेरित होकर आध्यात्मिकता का प्रसार करने वाली संस्था ‘मिशन हैप्पीनेस’ इस अमानवीय खेल को बेनकाब करने के लिए मुहिम शुरू की है।
मिशन हैप्पीनेस ने डॉक्टरों की आत्मा जगाने के लिए अपनी इस मुहिम की शुरुआत 12 जनवरी को आयोजित एक सेमिनार में की। सेमिनार का आयोजन किया। इस सेमिनार में दवाओं के खेल को पुण्य और पाप के नजरिये से देखने के साथ अपने पेशे की अहमियत को भी समझने की अपील की गई थी। सेमिनार में आए डॉक्टरों ने भी दवा कंपनियों के खेल से दूर रहने का भरोसा दिलाया। बता दें कि मिशन हैप्पीनेस 2000 से सस्ते दामों पर दवाएं उपलब्ध करा रहा है। मिशन हैप्पीनेस के डिवाइन एसोसिएट गोपाल शरण ने बताया कि एक ही साल्ट और मात्रा की दवाओं पर कई गुना का अंतर है। डॉक्टर कमीशन के लिए महंगी दवाएं लिखते हैं जबकि बाजार में उसी साल्ट और मात्रा की सस्ती दवाएं उपलब्ध हैं।
मुनाफाखोरी की कोई सीमा ही नहीं
बुखार, दर्द, सर्दी जुकाम, खांसी, पेट दर्द, जख्म भरने के साथ आयरन-कैल्शियम जैसी दवाओं पर भी ब्रांडेड कंपनियां 50 से 100 प्रतिशत तक ज्यादा कीमत वसूल कर रही हैं। मैन्युफैक्चरिंग से लेकर मार्केटिंग तक का खर्च मिलाने के बाद कंपनियाें का मुनाफा बेहिसाब है। मिशन हैप्पीनेस के गोपाल शरण बताते हैं कि उनकी संस्था करीब 81 दवाओं का निर्माण कर रही है। प्रत्येक दवा लोगों को बीमारी से मुक्त कराने के लिए है। जबकि दूसरी कंपनियां दवा के नाम पर लूट का कारोबार चला रही हैं।
दवा कंपनियों का खेल: मात्रा कम लेकिन कीमत चार गुनी
शहर के दवाओं के एक थोक विक्रेता नाम न छापने की गुजारिश करते हुए बताते हैं कि डीपीसीओ (ड्रग प्राइस कंट्रोल ऑर्डर) ने दवाओं की कीमत निर्धारित कर दी है। ऐसे में अब एक नया खेल दवा कंपनियों ने शुरू किया है। वह लिस्ट में दर्ज दवा के नाम से अलग फार्मूला बनाकर दवा बेच रहे हैं। कमीशन ज्यादा होने के कारण डॉक्टर भी डीपीसीओ के बाहर की दवाएं लिख रहे हैं। दो साल्ट मिक्चर की एमआरपी कम और सिंगल साल्ट की अधिक रखी है जबकि सिंगल साल्ट के रेट और कम होने चाहिए। जैसे: थायरोनॉम का 25 एमजी 165 रुपये तो 50 एमजी 123 रुपये है। एटोरवास्टिन का अजटार 10 एमजी, 15 टेबलेट 83 रुपये और इसी ब्रांड का एटोरवास्टिन और एस्पिरिन का मिक्सचर 10 टेबलेट 26 रुपये में है। सिपला की एटोरलिप 10, 83 रुपये तो वहीं जिवास्ट की एटोरलिप टेबलेट 37 रु पये की बाजार में बिक रही है। फाइजर की प्रीगैबलिन कैप्सूल 884 रुपये में 15 टेबलेट तो इंटास की यही कैप्सूल 151 रुपये में 14 टेबलेट मिल रही है। मोक्सिफ्लॉक्सेसिन आई ड्रॉप 129 रुपये तो वहीं, मोक्सिफ्लॉक्सेसिन और डेक्सामेथेसोन आई ड्रॉप का मिश्रण महज 59 रुपये में उपलब्ध है। कहा कि, यह सब खेल कंपनियां और डॉक्टरों की मिलीभगत से चल रहा हैं।
एक ही साल्ट की अलग-अलग दवाओं के दाम अलग हैं। मरीजों को जबरन दवाएं लिखीं जा रही हैं। उनका ईमानदारी से इलाज नहीं हो रहा। डॉक्टर अपनी क्षमता का दुरुपयोग कर रहे हैं। - डॉ. नईम सिद्दीकी, अध्यक्ष, नीमा
सेमिनार बेहतर था जो दवा कारोबार की हकीकत बताता है। कुछ डॉक्टरों द्वारा जबरन मरीजों को महंगी दवाएं लिखी जा रहीं हैं। यह गलत है क्योंकि दुआ बद्दुआ दोनों का असर होता है। - डॉ. विशाल, सदस्य, नीमा
कार्यक्रम में जीवन की सच्चाई से रूबरू हुए। हकीकत यही है कि दवाओं के नाम पर बड़ा कारोबार हो रहा है जिसकी रोकथाम जरूरी है ताकि किसी गरीब की हाय न लग सके। - डॉ. आरएस लोधियाल, सदस्य, नीमा