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गुरूजी! बच्चों को पढ़ना सिखाएंगे या सेल्फी लेना

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बरेली। सरकार हर बार तमाम स्कूलों का डाटा लेकर छात्रों को बेहतर सुविधा और शिक्षा देने के प्रयास करती है। लेकिन सरकार के इस पहल को कैसे पलीता लगाया जाता है, इसकी बानगी स्कूलों के स्टाफ को प्रशिक्षित करने के लिए आयोजित यू-डाइस (यूनाइटेड डिस्ट्रिक्ट इंफॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन प्लस) प्रशिक्षण के दौरान दिखाई दी। जहां स्कूलों के प्रतिनिधि और कंप्यूटर ऑपरेटर प्रशिक्षण को गंभीरता से लेने के बजाय सेल्फी लेने में व्यस्त रहे। बार-बार ट्रेनर द्वारा मोबाइल के बजाय प्रशिक्षण पर ध्यान देने की अपील की परवाह किए बगैर ज्यादातर लोग मोबाइल में ‘चैटिंग’ करते नजर आए।
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सोमवार को जीआईसी में यू-डाइस डाटा कैप्चर फॉर्मेट को सही ढंग से भरने के लिए पहली पाली में राजकीय, सहायता प्राप्त, सीबीएसई, आईसीएसई, मदरसा बोर्ड और दूसरी पाली में वित्त विहीन मान्यता प्राप्त विद्यालयों के प्रधानाचार्य व कंप्यूटर ऑपरेटर बुलाए गए थे। डीआईओएस डॉ. अचल कुमार मिश्र ने प्रशिक्षण कार्यक्रम का शुभारंभ किया। जिसके बाद ट्रेनिंग प्रोग्राम के इंचार्ज डॉ. लोकेश चंद्र, विकास पाठक और सोनू यादव ने बारी-बारी से डाटा कैप्चर फार्मेट भरने की जानकारी प्रोजेक्टर के जरिए दी। ट्रेनर 11 भागों में विभाजित फॉर्मेट की सघन जानकारी दे रहे थे तो दूसरी ओर, लोग अपने-अपने मोबाइल में व्यस्त रहे। पहली पाली में अधिकारियों की मौजूदगी के चलते माहौल ठीकठाक रहा लेकिन दूसरी पाली में विद्यालयों के प्रतिनिधि बच्चों का भविष्य संवारने के बजाय माहौल को बिगाड़ते रहे। ट्रेनर और जीआईसी प्रधानाचार्य डॉ. अवनीश यादव ने अव्यवस्था देख मौजूद सभी को प्रशिक्षण की जरूरत और यू-डाइस का उद्देश्य और उससे छात्रों का बेहतर भविष्य बनाए जाने की कवायद की विस्तृत जानकारी दी लेकिन अपील बेअसर रही।

92 विद्यालयों के प्रतिनिधि अनुपस्थित
विकास पाठक ने बताया कि यू-डाइस डाटा कैप्चर फॉर्मेट के प्रशिक्षण में 465 विद्यालयों के प्रधानाचार्य और कंप्यूटर ऑपरेटरों को शामिल होना था। करीब 92 विद्यालयों के प्रतिनिधि शामिल नहीं हुए। पहली पाली में 196 और दूसरी पाली में 177 लोग ही उपस्थित रहे। कहा, अनुपस्थित रहे लोगों को कार्यालय बुलाकर प्रशिक्षित किया जाएगा।
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कैसे पढ़ाएंगे स्वच्छता मिशन का पाठ
विद्यालयों के प्रतिनिधियों ने पीएम की महत्वाकांक्षी योजना की धज्जियां उड़ाने में कोई कोर कसर बाकी नहीं रखी। पानी पीने के बाद रखे गए डस्टबिन में डिस्पोजल फेंकने के बजाय लोग कॉलेज परिसर में ही डिस्पोजल फेंक कर चलते बने। प्लास्टिक के डिस्पोजल बैन होेने के बावजूद पेयजल के लिए प्लास्टिक डिस्पोजल की व्यवस्था थी।
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